काव्य भाषा : पर्णकुटी – रानी पांडेय,रायगढ़

पर्णकुटी

अरण्य मे एक पर्णकुटी,
इसकी धवल आत्मा में ,
बसते जाने किसके प्राण
किनके अधरो से छुते ही,
कलियाँ खिलकर फ़ूल बनी ,
किनके कदमों की आहट से
जग गया निखिल अरण्य,
किसकी सुगंध से लगे
झूमने द्रुम- निकर ।
हवाएँ आकर संदेश है देती
ना जाने किसके आने की
दुर्र्चर राहे हुई सुलभ ,
दधिति किसके धोए चरण ,
दिगन्त सिमट कर एक हुई,
दिक्पाल उतर आए धरती पर
दिव्य दिशाएँ दबक तमस
बाँधे ललाट पर दिनकर कौन?
देवधूनी आयी चलकर धोने,
किन चरणों के पावन धूल ,
अरी अम्बुद आएँ छूने ,
दोहर में लपेटे दिवासान ,
किनके लटों से लिपटी घटाएँ
नभ भी बरसाए अमी रस ,
संग जिनके एक दिव्यांगना ,
दिढि से अरण्य प्रकाशमान,
बँध गयी प्रकृति दीढ़बंध से
राहे देखती बस दो चक्षु ।
संग दिव्यांगना के एक नन्दन
मुखमंडल जिनका दीप्तिमान
ये कौंन है जिनके आने की
राहें तकती ये पर्णकुटी।
बज रहा दगड़ दिव क्षितिज पर
सब करते हैं नव कर प्रणाम
आये देवनिकाय से दो ,
सुकुमार देव समान ।
इस पर्णकुटी में एक जर्जर काया ,
अहर्ण करे उनकीं जो दिनमान ,
अहोलादित हो अश्रु बहे,
अबरे दरस दिये तुम भगवान्।
संग अर्द्धांगिनी-भ्राता सहित
पावन करो ये पर्णकुटी।
शबरी ही नहीं तुम्हरी
संग राहें देखी ये पर्णकुटी।

रानी पांडेय
रायगढ़,छत्तीसगढ़

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