लघुकथा : पर्यावरण – आर एस माथुर इंदौर

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लघुकथा

पर्यावरण

कल पर्यावरण दिवस था और डायरेक्टर साहब ने उसे जोर शोर से मनाने के लिए सबको आदेश दिया था । करीब सौ ट्री गार्ड , डेढ़ सौ पौधे ,सबके लिए मिठाई, लाउडस्पीकर और कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग ,प्रचार,,,
दफ्तर के लोग बड़े खुश कि मंत्री जी भी आएंगे। अखबार में खबर और फोटो छपेंगी लेकिन उन में से असंतुष्ट दल के एक आदमी ने पूछ ही लिया ,,
“इतना खर्च क्यों? ये पौधे चलेंगे थोड़ी। पिछले वर्ष जो लगाए गए, क्या हुए? वो ट्री गार्ड तो साहब के,,,”
“चुप रहो। कोई कह देगा तो उल्टी पड़ जाएगी।”
“अरे भाई तुम जानते नहीं हो अपने विभाग को जो फंड हर वर्ष मिलता है पौधरोपण के लिए, पर्यावरण को सुधारने के लिए, नहीं मनाएंगे तो अगले वर्ष से डूब जाएगा।”
“बिल कितने पौधों का, ट्री गार्ड का भाव क्या और नाश्ते पर खर्च का एस्टीमेट कितना और वास्तव में कितना? ”
” हां सो तो है । दोनों में एक और तीन का अंतर तो होगा।”
“ये भी तो प्रदूषण है। इसको दूर करने की भी कोई तो तिथि या आयोजन होना चाहिए कि नहीं?”

आर एस माथुर
इंदौर

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