काव्य भाषा : काट रहे हो पेड़, बचेगा जीवन कैसे -प्रमिला श्री ‘तिवारी’धनबाद

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रोला छंद
काट रहे हो पेड़,बचेगा जीवन कैसे

1.

करते हो अपराध, पेड़ क्यों काटा करते ।
निज कर्मों का आज,मनुज फल भोगा करते।।
समझो कुछ इंसान, बड़ा करते हैवानी।
देते वृक्ष महान, हमें ये दाना पानी ।।

2.

मचा है हाहाकार, प्राणवायु का जैसे ।
काट रहे हो पेड़, बचेगा जीवन कैसे।।
देते पेड़ महान, हवा जल शीतल सबको।
पेड़ो को मत काट,यही कहना है हमको।

स्वरचित व मौलिक
प्रमिला श्री ‘तिवारी’धनबाद
(झारखण्ड)

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