काव्य भाषा : मनुहार – शशि बाला हजारीबाग

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मनुहार

सिर मोर मुकुट,कर बांसुरिया
हैं सुंदर नंदकुमार यही।
चितचोर हैं माखनचोर मेरे
मन मंदिर के उजियार यही।

मेरे श्वास जपे हर पल इनको
इस जीवन के आधार यही।
वृषभानु सुता के गिरिधर ये
हैं सकल सृष्टि के सार यही।

सब ग्वाल बाल के संगी सखा
ब्रज गोपिन के दिलदार यही।
दृग कातर हों ,मन विह्वल हो
करने आए उद्धार यही।

गले माल बैजंती,पीत वसन
हैं मधुबन के गुंजार यही।
यही पालक हैं यही रक्षक हैं
दीनों के तारणहार यही।

हे गोविंदा!हे मधुसूदन!
हे कमलनयन !हे मनमोहन!
चरणों से भटके ध्यान नहीं
तुमसे है बस मनुहार यही।

शशि बाला
हजारीबाग

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