काव्य भाषा : हरियाली – राजीव रंजन शुक्ल ,पटना (बिहार)

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हरियाली

हरियाली धरती की गहना
नदी तालाब है इसकी बहना
है स्वार्थी हम मानव
प्रकृति रौंदा बन दानव
शायद हमसे अच्छे पशु-पछी
प्रकृति से उनकी दोस्ती
हम से अच्छी
जंगल में पशु-पछी करते मंगल
नदी बहती कर कल-कल
किया हमने प्रकृति का नाश
नाम दिया इसका विकास
काटे पेड़ और सुखाई धरा
खेत जलाया ,काटा जंगल हरा-भरा
हरी धरा को मरुथल बनाया
पर्यावरण दिवस मना कर्तव्य जताया
पेड़ पौधों और जंगल की
अंधाधुन कटाई
फिर क्यो हरियाली की उम्मीद लगाई
काश यदि ऐसा न होता
पशु मानव न बिन पानी मरता
गर्मी से धरती नहीं तपता
नदी-तालाब मे पानी से भरा रहता
धरा रहती हरी भरी
चहुं ओर हरियाली होती
यदि नहीं अब है रोना
आगे की पीढ़ी को यदि कुछ है देना
तो पेड़-पौधे लगाना
पेड़ – पौधे बचाना
हरियाली धरती का गहना
धरती को पुनः है पहनना
हरियाली फिर है लाना
धरा को फिर हरा भरा बनाना॥

राजीव रंजन शुक्ल
पटना (बिहार)

1 COMMENT

  1. बहुत अच्छी कविता।प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी है जिसका निर्वहन हम सब को मिल कर करना है।

    शुभकामनाएं

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