काव्य भाषा : धरा की पुकार – भारती यादव ‘मेधा’ रायपुर, छत्तीसगढ़

धरा की पुकार

कर रही हूँ करुण पुकार,
कर दो मेरा फिर श्रृंगार,
होगा मुझ पर यह उपकार,
ना समझते, हूँ मैं ही जीवन आधार।

हरा भरा था दामन मेरा,
था कलरव करते पंछियों का डेरा,
जीवन पलता था मेरी छाँव तले,
काट डाले जंगल, अपने स्वार्थ के लिए।

बहती थी निर्बाध नदियों की धारा,
झरनों का था संगीत निराला,
ताल, सरोवर और झील किनारा ,
बांध दिया सबको, कह, विकास है सारा।

ना पेड़ बचे, ना कानन प्यारा,
सोंधी खुशबू माटी की, ना बहती मद मस्त बयारा ,
ना रही रत्न गर्भा अब मैं , ठूँठ किया वन सारा,
खड़ा किया कंक्रीट का जंगल, किया खतरे में अस्तित्व हमारा।

फैला प्रदूषण, हो रहा है पानी कम,
घुट रहा है तन, हो रही साँसे बेदम,
फिर भी ना चेते, कैसा है मानव मन,
सुन लो, करो अब तो पर्यावरण संरक्षण।

अस्तित्व तुम्हारा रहेगा मुझसे ही,
ना रह पाओगे बिन हवा के तुम भी,
वृक्ष हैं तुम्हारे जीवन दाता,
क्यों ना फिर इन्हें बचाना आता।

कर दो श्रृंगारित मुझको, तुम फिर से,
हरा भरा मेरा दामन कर दो,
पेड़ लगाओ, नदियाँ बचाओ,
अब तो करुण पुकार मेरी तुम सुन लो।

भारती यादव ‘मेधा’
रायपुर, छत्तीसगढ़

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