सरोकार : बिना रोजगार कैसे होगा लोकल वोकल -भारत भूषण आर गाँधी

सरोकार : बिना रोजगार कैसे होगा लोकल वोकल

इटारसी मध्य प्रदेश का एक छोटा सा नगर है जिसमें रेलवे का बड़ा जंक्शन के होने के साथ साथ रेलवे के ही दो उपक्रम डीजल शेड और ऐसी लोको शेड है. जिसके कारण यहां रेलवे कर्मियों के परिवार बड़ी संख्या रेलवे कॉलोनी के अलावा नगर के कई इलाकों में रहते हैं. साथ ही इटारसी में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री भी है जो शहर से लगभग 12-13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. उसी से लगे क्षेत्र में एक आवासीय कोलोली है जिसमें भी बड़ी संख्या में कर्मचारी अपने परिवारों के साथ निवास करते हैं. सिंचाई विभाग के अंतर्गत तवा नदी पर बना बांध है जिससे संबध कर्मचारियों की आवासीय कॉलोनी तवानगर है और इटारसी नगर में उसी की विस्तार की छोटी कॉलोनी तवा कॉलोनी है. इटारसी में भारत संचार निगम का क्षेत्रीय कार्यालय भी है.

रेलवे के डीजल शेड अब सिमट गया है क्योंकि अबी रेलवे ट्रैक पर इलेक्ट्रिक इंजन दौड़ने लगे हैं. रेलवे कॉलोनियों में अब उतनी बसावट भी नहीं है जितनी पहले कभी हुआ करती थी. आर्डिनेंस फैक्ट्री की कुछ यूनिट अब बंद हो गई हैं, बहुत सारे कर्मचारी रिटायर हो गए हैं अब न उनके लिए और न ही उनके बच्चों के लिए कोई स्कोप इटारसी में बचा है. इसी तरह जब तक लैंड लाइन फोन का जमाना रहा तब तक दूर संचार काम करता रहा और उसका विस्तार होता रहा. तब तक बीएसएनएल के इस कार्यालय के अंतर्गत एक बड़े क्षेत्र में बड़ी संख्या में कर्मचारी और अधिकारी भी थे, इटारसी में बीएसएनएल महाप्रबंधक जैसे सर्वोच्च अधिकारी सहित अनेक अधिकारी भी थे. बाद में मोबाइल क्रांति ने सब कुछ समेट कर रख दिया. सनखेडा नाका में करोड़ों रुपये खर्च करके बनी बीएसएनएल कॉलोनी अनुपयोगी हो गई और आज वहां इस संपत्ति की देखभाल के लिए बीएसएनएल ने कोई सिक्यूरिटी गार्ड तक तैनात नहीं किया.

इटारसी की पहचान रहे अनेक विभागों के उपक्रमों के सिमटने से इटारसी का इकोनोमी सिस्टम भी ध्वस्त होता चला गया. इन सरकारी उपक्रमों की आवासीय कॉलोनियों में अनेक मकान खाली होने के कारण जर्जर हो चुके हैं क्योंकि अब इनमें कर्मचारी नहीं रहते. जो कर्मचारी रिटायर हो गए हैं वह या तो यहां से अपने आसपास के गांव शहर जाकर बस गए हैं या जहाँ से काम करने यहाँ आये थे सुदूर अपने अपने गृह नगर वापस लौट गए.
सारणी ताप विद्युत गृह जोकि बैतूल जिले में आता है वहां भी वहां का किसी ज़माने का छोटा बाजार इटारसी पर काफी निर्भर रहता था लेकिन अब सारणी और पाथाखेड़ा के आसपास बाज़ार का विकास हो जाने के कारण अब इटारसी का बाजार वहां के लोगों के लिए अनुपयोगी हो गया है.
कुल मिलाकर इटारसी की स्थिति पिछले कुछ सालों में धीरे धीरे दयनीय हो चली है. इटारसी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के युवक युवतियों ने जैसे तैसे अपनी पढाई पूरी कर तो ली है लेकिन उन्हें उनकी शिक्षा या ज्ञान के मुताबिक काम नहीं मिल रहा है. व्यवसायिक पाठ्यक्रमों से पढाई पूरी कर चुके युवक युवतियां सुदूर बड़े नगरों में नौकरी कर रहे हैं, गांव का युवक या तो दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है या किराने, कपड़े, मोबाइल, ऑटो या विभिन्न प्रकार की अन्य दुकानों पर मामूली वेतन पर नौकरी करने को मजबूर है वेतन इतना भी नहीं मिलता कि यह अपना खुद का गुजारा ठीक से चला सके.
इटारसी अनुभाग के लोगों की भलाई के लिए अब यहाँ कोई बड़ा उपक्रम या फैक्ट्री चाहे वह सरकारी हो या गैर सरकारी स्थापित हो ताकि कम से कम 10 से 20 हज़ार लोगों को रोजगार मिल सके और इटारसी के दुकानदार जो अधिकतर बैंकों के क़र्ज़ पर जैसे तैसे काम चला रहे हैं उनकी भी आर्थिक स्थिति में ससुधार हो सके. इटारसी से 23 किलोमीटर दूर बुधनी एक ऐसी जगह है जहां से प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विधायक हैं और उनकी कृपा दृष्टि से केवल दो उपक्रम वर्धमान और ट्राइडेंट नामक कंपनियों की इकाईयां स्थापित हो जाने के कारण लगभग 25 से 30 हज़ार लोग यहाँ से रोजगार पा लिए हैं. इन कंपनियों के कारण बुधनी का तेजी से विकास हुआ और बुधनी से सटे सभी गाँव भी विकसित हुए, सब्जी उगने वाले छोटे छोटे किसान अपना घर ठीक से चलाने लायक हुए. यहाँ तक कि कई आवासीय परिसर बनाने वाले बिल्डर भी खड़े हो गए.
इटारसी जो रेल हो या सड़क की दृष्टि से देश की चारों दिशाओं को जोड़ता है, जहाँ रेलवे का बड़ा माल गोदाम है, एक विशाल लॉजिस्टिक हब भी बन चुका है, रेलवे की एक और लाइन बिछ रही है जिससे रेल के द्वारा आवागमन और ढुलाई और ज्यादा आसान हो जाएगी. इतना सब होते हुए इटारसी का विकास कैसे होगा यह बड़ा सवाल है. क्योंकि रेलवे ने जो लॉजिस्टिक हब पवारखेड़ा में बनाया है उससे केवल कुछ हो लोगों या हम्मालों को काम मिल सकता है, बड़ी संख्या में रोजगार लोगों को मिले ये संभव नहीं है.
केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार सहित सभी बड़े उद्योगों की घरानों की ओर इटारसी के लोगों की आस भरी नजरें उठी हुई हैं. इटारसी एक उद्योग नगरी की तरह देश के नक़्शे में उभरे इस मांग के लिए बड़ी संख्या में लोग एकजुट हो कर रहे हैं और अपनी मांग को पूरी ताकत से उठा रहे हैं. एक अभियान सोशल मीडिया के द्वारा यहां खड़ा किया गया है जिसका नाम लोकल वोकल रोज़गार रखा गया है. अब इस ग्रुप की तैयारी है कि यदि उनकी मांग को नहीं माना गया तो वह एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते हैं. इनका कहना है कि अब जिम्मेदारों को उनकी आवाज़ सुनना ही होगी. देखना यह है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने महानगरों में काम करने वाले मजदूरों के वापस लौट जाने के कारण रोजगार को लोकल वोकल करने की बात कही थी देखना यह है की उनकी इस बात को किस प्रकार से इटारसी के लोकल लोगों की वोकल हुई आवाज को किस तरह से वह सुनते हैं.
यहां दो छोटे-छोटे इंडस्ट्रियल एरिया है जिनमें कोई खास ऐसे उत्पाद नहीं बन रहे हैं जिसके कारण विकास को माना जा सके यहां केवल वेयरहाउस या सोयाबीन की दो बड़ी फैक्ट्री यही है जो काम कर रही हैं. कई फैक्ट्री बंद हो चुकी हैं, एक स्थानीय बड़े घराने की भी यूनिटें इंडस्ट्री बंद हो गई है.
जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से लोन लेकर उद्यमी एक छलावा भरी ज़िन्दगी ही जी सकते हैं. इन दिनों इटारसी से मेडिकल कॉलेज की मांग भी उठने लगी है अच्छी मुहीम कही जा सकती है लेकिन जब रोजगार नहीं होगा तो इलाज ले पैसे कहाँ से लायेंगे. इसलिए पहले रोजगार की व्यवस्था हो उसके बाद शिक्षा या स्वास्थ्य की बात की जा सकती है. माना कि जीवन के लिए दोनों ही जरूरी है बिना शिक्षा के बिना ज्ञान मिलना और चिकित्सा के बिना स्वस्थ जीवन संभव नहीं है लेकिन बिना रोजगार तो यह बिल्कुल असंभव है.

भारत भूषण आर गाँधी
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता

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