हिंदी पत्रकारिता दिवस : 195 साल की हिंदी पत्रकारिता का अब ये है स्वरूप – प्रमोद पगारे,इटारसी

हिंदी पत्रकारिता दिवस : 195 साल की हिंदी पत्रकारिता का अब ये है स्वरूप

उदंत मार्तंड 30 मई 1826 को कोलकाता के कोलूटोला मोहल्ले की 37 नंबर अमड़ तल्ला गली से 8 × 12 पुस्तक आकार में प्रकाशित होना शुरू हुआ था। उदंत मार्तंड के संपादक जुगल किशोर सुकुल हुआ करते थे ।उदंत मार्तंड का मतलब समाचार सूर्य बिना दांत वाला ।अथवा बाल सूर्य, होता था । कोलकाता बंगाल से बांग्ला और अंग्रेजी के कई समाचार पत्र निकलते थे लेकिन हिंदी का यह पहला समाचार पत्र प्रारंभ हुआ था। इसीलिए 30 मई को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं। यह समाचार पत्र केबल डेढ़ वर्ष ही प्रकाशित हो सका एवम दिसंबर 1827 में बंद हो गया ।क्योंकि कंपनी सरकार दूसरे समाचार पत्रों जो बंगला और अंग्रेजी में निकलते थे, उनको तो डाक टिकट एवं अन्य कार्य में छूट देती थी, लेकिन हिंदी समाचार पत्र को कोई मदद नहीं करती थी । इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि बिना कंपनी सरकार के कोई भी समाचार पत्र नहीं चल सकता था। आज भी भारत में आजादी के बाद भी कमोबेश यही स्थिति है परंतु आर्थिक तंत्र दो बन गए हैं एक तो वह जो सरकार के भरोसे रहते हैं, और दूसरे वो जो पूंजीपतियों के हाथ में रहते हैं। 1980 तक पत्रकारिता में संपादकीय विभाग जीवित रहता था। बिना संपादक की सहमति के कोई कार्य समाचार के संबंध में नहीं हो सकता था। धीरे धीरे संपादकीय विभाग को मृतप्राय बना दिया। जो इज्जत दार थे वह इज्जत से नौकरी छोड़ कर चले गए। जो नहीं जा पाए उन्हें हटा दिया गया। राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, नरेंद्र तिवारी, प्रभाष जोशी ,विजय दत्त श्रीधर, महेश श्रीवास्तव, ध्यानसिंह तोमर राजा, सहित कई ऐसे उच्च कोटि के पत्रकार थे, जिनसे मालिकों ने दूरी बना ली 80 और 90 के बीच में समाचार पत्र विज्ञापन धारी हो गए। संपादकों की जगह मालिकों के चाटू कारों ने ले ली । बे प्रबंधक बन गए। चाहे कस्बे की पत्रकारिता हो अथवा शहर की ,पैसा है तो खबर है। एक कार्टूनिस्ट ने तो यहां तक कार्टून बना दिया पहले समाचार पत्र समाचार के लिए बिकते थे परंतु अब समाचार के पहले बिकते हैं ।बड़े-बड़े टारगेट दिए जाते हैं, जिन्हें पूरा करना मुश्किल होता है। ऐसे में पत्रकार बनकर जो आया है ,चाहे वह अपराधी हो अथवा उसका चरित्र कैसा भी हो वह पत्रकार बन जाता है अपना रसूख दिखाता है। बड़े-बड़े व्यवसाय घराने कॉलोनाइजर माइनिंग का कार्य करने वाले आबकारी के ठेकेदार अपनी ओर से पैसा जमा करा कर अपने लोगों को पत्रकार बनवा देते हैं। तो आप कल्पना कर सकते हैं पत्रकारिता करने वाला इंसान इन लोगों के बीच में कहां जिंदा रहेगा। फिर भी इस बात से संतोष है कि भारत में अभी भी कुछ प्रतिशत ही सही लेकिन पत्रकारिता मैं ईमान जिंदा है। समाचार पत्रों के अलावा यही दुर्गति टेलीविजन चैनल एवं यूट्यूब चैनल में हो रही है ।आप पर पैसा है आप आईडी ले आओ। फिर आपका राज्य है। सोशल मीडिया अपना अलग कर्तव्य दिखा रही है। यदि किसी ने कुछ छुपाने की जरूरत भी की तो सोशल मीडिया उसको आइना दिखा देता है। सोशल मीडिया भले ही विश्वसनीय ना हो लेकिन समाज में उसने अपना स्थान बना लिया। 195 वर्ष की पत्रकारिता जो दो शताब्दी पूर्ण करने जा रही है, हिंदी की पताका निरंतर लहराती रहे। जब वह अच्छा समय नहीं रहा तो यह खराब समय भी नहीं रहेगा। फिर अच्छे दिन आएंगे। यही उम्मीद है।

– प्रमोद पगारे,इटारसी