काव्य भाषा : नारी और पाजेब – चरनजीत सिंह कुकरेजा, भोपाल

“नारी और पाजेब “

नन्हें पैरों की मासूम सी पाजेब
जब युवावस्था में प्रवेश करती है
तब उसमें पिरो दिए जाते हैं
नारी जीवन के ठोस बिंदुओं को दर्शाने के लिये
छोटे छोटे घुंघरू….!
ताकि वह इनकी झंकार सुन कर
अपने डगमगाते कदमों पर नियंत्रण रख सके।

यह बात अलग है कि,
जीवन की कटु सच्चाइयों से खींचातानी में
“पाजेब” टूट जाती है….
और बिखरे हुए घुंघरुओं को समेटने में
नारी का सम्पूर्ण जीवन ही व्यतीत हो जाता है।

और जब वह
अपने जीवन के बिखरे हुए घुंघरुओं को पंक्तिबद्ध पिरोकर
पुनः पाजेब का रूप देती है
तो उसके उमंग भरे चेहरे की झुर्रियां
उसे यह पाजेब पहनने से रोक लेती हैं।
और वह…..
अपने हाथों से सहेजी हुई
इस अनमोल पाजेब को
अपनी कोख से जन्मी
लाडली के पैरों में पहना देती है..
एक बार फिर से बिखरने के लिये……..!!!

चरनजीत सिंह कुकरेजा,
भोपाल

3 COMMENTS

  1. आदरणीय मैं अपनी लघुकथा या काव्य रचना प्रेषित करना चाहती हूं
    सादर
    जया आर्य
    भोपाल

    • हमारे व्हाट्सएप 9111460478 पर भेज दीजिये या वेबसाइट पर ही दिए गए लिंक ” रचना अपलोड करें ” में प्रेषित कर दीजिये।

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