काव्य भाषा : पराग-नीलम द्विवेदी रायपुर

पराग

सुरभित पराग के कण,
फूलों के अंतर में महके,
पराग के कण कण में,
जीवन के रस बहते,
परागविहीन पुष्पों में,
आते न कोई भँवरे भी,
फूलों का रस पीने आते,
पराग बिखराते भँवरे ही,
भँवरों के मन को भाता,
तितली को भी मधुर लगे,
पग में लग के इनके पराग,
दूजे फूलों तक सफर करे,
नवजीवन बीजों को देने,
करे परागण नित्य हवाएँ,
सूक्ष्म कणों में अद्भुद शक्ति,
महकाया इसने सारी सृष्टि,
दिया प्रेम का सुंदर संदेश,
मिटकर भी रहते अवशेष।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़।

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