काव्य भाषा : ग़ज़ल – प्रमिला श्री ‘तिवारी’ धनबाद

ग़ज़ल

याद आई है वही गुज़री कहानी आज फिर।
यूँ लगा जैसे हुई है रुत सुहानी आज फिर।

फासला जो बढ़ गया तो बढ़ गई तनहाइयाँ,
ये हुई हैं प्यार की अपनी कहानी आज फिर।

रूठकर खुशियाँ गई बस है बची वीरानगी,
वक्त़ ने कैसा दिया है ये निशानी आज फिर ।

जख़्म जो नासूर बनकर हर तरफ आबाद है,
लग रही बेनूर सी ये जिंदगानी आज फिर ।

खो चुके हैं हादसों में आज अपनों को बहुत,
सोचना हैं क्या हुई हमसे नादानी आज फिर ।

प्रमिला श्री ‘तिवारी’
धनबाद

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here