काव्य भाषा : मुक्तक – अनिल साहू,प्रतापपुर

।मुक्तक छंद।

।।1।।
कलह घर -घर मे होती है,
मगर अपनी खबर मत दो।
विषय है जगहंसाई का,
थोड़ा लड़ लो,मगर हँस दो।
समरभूमि में मुश्किल है,
बीवी से जीत कर आना।
पड़े एक गाल पर चाटा,
तो दूसरा भी फटाफट दो।।

।।2।।

वो तेवर देख बीवी का ,
जो अक्सर चुप रहा करते।
मार चौकी व बेलन के,
सदा वो दूर से बचते।
जो अपनी गलतियों को मानकर ,
प्रणाम करते हैं,
धुनाई घर मे होती है,
लोकनिंदा से बच जाते।।

।।3।।

जो बीवी बाज न आये ,
तो ज्यादा सर खपाना ना।
गलत जो दूसरों ने की,
उसे तुम भी दुहराना ना।
करो कुछ कम ऐसा की ,
सदा ही रूठ जाए वो।
मजा लो फिर अकेले का ,
उसे जाकर मनाना, ना।।

अनिल साहू,प्रतापपुर

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