काव्य भाषा : शून्य से शून्य तक का गणित – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

शून्य से शून्य तक का गणित

खूब कमाया
सब गंवाया..
जीवन अर्थ समझ न पाया।
गुणा-भाग किये बहुतेरे,
तोड़ा जोड़ा और घटाया..।

त्रिभुज चतुर्भुज समकोण
बनाये,
दृष्टिकोण पर गड़बड़ाया।
मनगणित भी ….
फेल हो गए,
हासिल का –
कुछ हाथ न आया….।

सीधी रेखा चलने की ठानी,
वक्र रेखाओं ने
उलझाया।
विकृत हो गई
आकृतियां सारी,
विपदाओं का
जब दौरा आया।

धीरज रख *असंतोषी* मन,
मुकद्दर से कोई-
कहाँ लड़ पाया!!!
हाशिये पर खड़े-खड़े ही,
वर्तमान से ..
हाथ मिलाया..।

शून्य से शुरू हुआ था
जीवन…
फिर शून्य पर –
लौट है आया..।
है शुक्राना ईश्वर का बंधू..
वक्त के रहते-
छूटी माया…।

खाली हाथ ही-
जाना सबको…
सिकंदर ने भी-
यही दर्शाया..।
लॉक डाउन भला हो तेरा..
इस सच को
तूने समझाया।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. संसार की असारता को अभिव्यक्त करती हुई बहुत ही सुन्दर संदेश देती और आध्यात्मिक चिंतन को प्रेरित करने वाली बेहतरीन रचना के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय।
    👏👏👏🙏🙏🙏👏👏👏

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