काव्य भाषा : आओ अपने घर चलें – मनोज कान्हे ‘शिवांश’ इंदौर

आओ अपने घर चले

शोर शराबा, यंत्र तंत्र से, दूर चले कही दूर चले,
हरियाली की गोद चलें, पगडंडी की ओर चलें,,,,
आओ अपने घर चले…।।

वो माटी का चूल्हा, वो मिट्टी की खुशबू, 
छोड छाड़ ये शहर चले,
आओ अपने घर चले….।।

वो रोटी जिसके हिस्से चार, इंसानियत के किस्से हजार,
उस प्रेम नगर की ओर चले,
आओ अपने घर चले….।।

संस्कार यही हर घर अपनाए, भूखा द्वारे से न जाए,
उस प्रेम प्रीत की डगर चले,
आओ अपने घर चले ।

आजाद परिंदे, दाना पानी, मानवता की अनमोल निशानी,
इस भीड भाड़ से दूर चले,
आओ अपने घर चले,,,,,
आओ अपने घर चले,,,, ।।

@ मनोज कान्हे ‘शिवांश’
इंदौर

   

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