भारत जैसे विशालकाय देश में किस हद तक संभव है सोशल डिस्टेंसिंग -सतीश भारतीय सागर

भारत जैसे विशालकाय देश में किस हद तक संभव है सोशल डिस्टेंसिंग

सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरीकरण एक ऐसा शब्द है जिसकी वैश्विक स्तर पर एक विस्तृत पैमाने में आहट हमारे सम्मुख 21वीं सदी में कोरोनाकाल के वक्त वर्ष 2020 में आयी लेकिन ऐसा नहीं है कि सोशल डिस्टेंसिंग शब्द हमें पहली बार सुनने मिला है या हमारे सामने पहली बार आया बल्कि यह शब्द इतिहास में उस वक्त विशिष्ट रूप से हमारे सामने आया था जब सेंट लुइस में, 1918 में फ्लू महामारी के दौरान शहर में इन्फ्लूएंजा के पहले मामलों का पता चलने के तुरंत बाद, अधिकारियों ने स्कूल बंद करने, सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध और अन्य सामाजिक दूरीकरण करने वाले हस्तक्षेपों को लागू किया था।

यदि हम इस दौर की बात करें तो जब से हमारे देश में कोरोना ने दस्तक दी है तब से सोशल डिस्टेंसिंग जैसे शब्द की विस्तृतता भी व्यापक हुई है तथा हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बड़े-बड़े ख्याति प्राप्त लोगों द्वारा सामाजिक दूरीकरण के संदेश सुनने को मिले और टेलीविजन से लेकर छोटी-बड़ी इमारतों की दीवारों पर भी सोशल डिस्टेंसिंग के विज्ञापन हमें देखने एवं पढ़ने मिले तथा इस दौरान काफी हद तक सार्वजनिक जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग भी देखने को मिली। लेकिन हमारे मस्तिष्क में यह प्रश्न प्रजनित होना निहायती अवश्यंभावी है कि विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से द्वितीय स्थान रखने वाले हमारे इस विशाल देश में सोशल डिस्टेंसिंग किस हद तक संभव है?

हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि से आलम यह है कि बसों में ठूंस-ठूंस कर यात्रियों को ले जाया जाता हैं और रेलों में लोग टायलेट के समीप तक बैठकर सफर करते तथा दशा यह होती है कि आवागमन के साधनों में पैर नीचे रखने के लिए भी जगह नहीं रहती है फिर भी लोग सफर करने को मजबूर हो जाते हैं।

वहीं भारत में दुनिया के महज एक फीसदी वाहन हैं जिन पर हमारी आवाम आवागमन के लिए अवलंबित रहती हैं तथा यह भी सत्य है कि सड़क दुर्घटनाओं में सर्वाधिक मौतें हमारे भारत में ही होती है। हालांकि इस कोरोना काल में अधिकांशतः आवागमन के साधनों पर सरकार के द्वारा रोक लगा दी गयी।

भारत के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल तथा मध्यप्रदेश जैसे राज्य क्रमशः शीर्ष पायदान पर है जिनमें बस स्टैंडों से लेकर रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ का नजारा काफी विकराल दिखता है जहाँ सोशल डिस्टेंसिंग की कल्पना करना दुर्भेद्य है तथा जिस प्रकार हमने शीर्ष जनसंख्या वाले राज्यों का जिक्र किया है उसी तरह हम यदि शीर्ष जनसंख्या वाले शहरों का जिक्र करें तो भारत में मुम्बई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, इंदौर, भोपाल, पुणे, पटना आदि ऐसे शहर है जिनकी जनसंख्या काफी ज्यादा है और यहाँ के बाजारों से लेकर सार्वजनिक स्थानों एवं सड़कों पर भी भीषण भीड़-भाड़ रहती है।

दूसरी ओर हमारे देश में हमें कोरोना काल में चुनावी क्षेत्रों का आलम देखकर लग रहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग जैसा शब्द यहाँ से कोसों दूर है आपको आगाह कर दें कि 30 अप्रैल को तेलंगाना में होने वाले निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बी.संजय कुमार की रैली में जबरदस्त भीड़ का जमावड़ा लगा जबकि बीजेपी ने बंगाल में कहा था कि हमारी रैली में 5000 हजार से ज्यादा लोग नहीं होगें और इसके साथ में आप बंगाल चुनाव का नजारा देख ही रहें हैं तथा इससे आप तसव्वुर कर सकते हैं कि हमारे राष्ट्र में सोशल डिस्टेंसिंग किस सीमा तक है? जब हमारे देश में इस कोरोना काल में चुनावों के दौरान प्रचार अभियान में, कुम्भ स्नान में, नेताओं की सभाओं में, धार्मिक आयोजनों में आदि में सोशल डिस्टेंसिंग की सीमाओं के सभी बन्धन टूट जाते हैं तो हम कोरोना को रोकने के लिए कहाँ तक सोशल डिस्टेंसिंग की कल्पना कर सकते हैं या फिर किस दायरे तक हमारे देश में कोरोना को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन संभव है? और विचारणीय है कि क्या वाकई सोशल डिस्टेंसिंग से कोरोना पर नियंत्रण किया जा सकता है।

सतीश भारतीय
सागर

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