लघुकथा : बेवकूफ़ – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

बेवकूफ़
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‘क्या सविता दो बच्चों की माँ हो तुम…अभी तक तुम दुनियादारी निभाने का सलीका नही सीख पाई…दिन रात घर की सफाई,बच्चों की पढ़ाई और मुझसे ढिठाई….पूजा घर से रसोई और रसोई से घर आँगन बुहारने के सिवा तुमने कुछ सीखा ही नही….जानती हो ऐसी औरतों को समाज में *बेवकूफ* कह कर बुलाते हैं…जो दिन रात घर में ही खटती रहती हैं…।वो अंजू को देखो तुम्हारी चचेरी बहन..पति के काम में पूरा हाथ बंटाती है…बैंकिंग और शेयर मार्केट के सारे कामों में सिद्धहस्त है वो…तुमने तो कभी घर के अलावा और कुछ सीखने की कोशिश ही नही की…’
‘ठीक है..ठीक है राजन….मानती हूँ अंजू ज्यादा पढ़ी लिखी है,पर उसके बच्चे एक ही क्लास में दो-दो बार फेल हो रहे हैं…पति शराब में मदमस्त हो घर आता है… उसकी सासू माँ ‘आया’ के भरोसे बिस्तर पर ही अपनी अंतिम साँसे गिन रही हैं..उस सबका क्या…? कहने दो सबको मुझे *बेवकूफ,* पर तुम तो मत कहा करो….पता है तुम्हारे बार-बार मुझे *बेवकूफ़* करार देने से मेरे दिल को कितनी चोट पहुंचती है….देखो,तुम्हारे घर और बच्चों की परवरिश से बढ़कर मेरे लिए और कुछ भी मायने नही रखता..समझ गए….’ कहते हुए सविता ने राजन को सुबह की चाय थमाई और बिस्तर की सलवटें ठीक करने लगी।
‘ चलिये चाय पीजिए और मेरे आने तक फ्रेश हो जाइए…मैं बच्चों को स्कूल बस में बिठा कर आ रही हूँ…माँजी भी मंदिर से आती ही होंगी…लौट कर मुझे नाश्ता भी बनाना है।’
अभी वह नहा कर बाहर आया ही था कि,कॉलोनी के गार्ड की आवाज सुनाई दी ‘राजन साहब!!!जल्दी बाहर आइये…सविता मैडम का एक्सीडेंट हो गया है….बच्चों को बस में बिठा कर लौट रही थी मैडम…रोड क्रॉस करते हुए एक कार उन्हें टक्कर मारते हुए निकल गई साहब…मेरी आँखों के सामने….पता नही कौन सी चिंता में खोई हुई थीं वह…’ बहादुर एक साँस में ही सब वाक्या कह गया..।
राजन जैसे-तैसे अस्त-व्यस्त कपड़े पहनते हुए खुद को संभालता हुआ दौड़ते हुए बाहर भागा..और बहादुर का थरथराता हाथ पकड़ घटना स्थल पर पहुँचा… *बेवकूफ* सविता खून से लथपथ लगभग कराहती हुई सड़क पर पड़ी थी। मोबाइल से फोटो खींचती संवेदनहीन भीड़ को चीरता हुआ वह उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।बहादुर के फोन करने पर एम्बुलेंस तो आई…पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी…।
‘ राजन…राजन बेटा..’ कंधे पर ममतामयी माँ के हाथ का स्पर्श पाते ही उसकी तन्द्रा भंग हुई । ‘ बेटा वो औरतें सविता को नहलाने ले गईं हैं…अंतिम बिदाई देनी है न बहू को…जरा उसकी अलमारी से शादी वाली लाल साड़ी निकाल कर दे,जिसे पहन वह पहली बार इस घर में आई थी ..’
वह तत्काल लेकिन कमजोर कदमों से भीतर आकर अलमारी खोलने का प्रयास करने लगा…। ‘माँ आप ही निकाल लो ढूंढ कर वह लाल साड़ी….’
माँजी ने अलमारी में रखे अन्य कपड़ों के सबसे नीचे दबी वह साड़ी खींच कर बाहर निकाली….।खींचते हुए साड़ी के तहें खुल गई और तहों के बीच दबे जेवरात और बेतरतीब रखे नोटों के साथ एक लिफाफा फर्श पर गिर गया । पास खड़े उसके दोस्त ने नीचे गिरा सारा सामान समेटा और लिफ़ाफे सहित उसे थमा दिया।
अपना नाम लिखे लिफ़ाफे के भीतर रखे ख़त के मज़मून को भीगी आँखों से उसने पढ़ना शुरू किया…’ राजन मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ…अपना फर्ज निभाते हुए मुझे कभी कुछ हो जाये तो ये धन संपदा जो मैंने तुम्हारे दिए मासिक घरखर्चों की बचत से जमा की हैं…गुड्डो और राजू की ऊँची पढ़ाई में खर्च कर देना …। मैं तो अपनी माँ से बचत करना और परिवार की खुशहाली के लिए जी जान से समर्पित होना ही सीख पाई । तुम बच्चों को वह सब सिखाना जो तुम्हारी *बेवकूफ* पत्नी नही सीख पाई । काश!!तुमने मुझे कभी वह सब सिखाने की कोशिश की होती…अपने हर काम में मुझे स्वयं ही शामिल किया होता….मैं तो थी ही पैदायशी *बेवकूफ*…पर तुमने भी कभी अपनी ओर से मुझे *अक्लमंद* बनाने की पहल नही की…।’
ख़त पूरी तरह उसकी पथराई आँखों से टप टप टपकते आँसुओं से भीग चुका था….। आज एक *बेवकूफ़* पत्नी अपनी अक्लमंदी से समझदार पति को *बेवकूफ़* साबित करते हुए अपने अंतिम सफर के लिए तैयार हो रही थी लाल जोड़े में….।

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चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

    • बधाई आ कुकरेजा जी इतनी अच्छी लघुकथा के लिए। जया आर्य।

  1. उम्दा, ह्रदयस्पर्शी और मार्मिक रचना के लिए बधाई 👏👏👏और नमन 🙏🙏🙏 ।

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