काव्य भाषा : पतझड़ – कुन्ना चौधरी जयपुर

पतझड़

एक एक करके पत्ते गिरते गये ,
डालियों से वो बिछड़ते गये ,
कुछ ऐसा ही मौसम आया है ,
हम पल पल खुद से जुदा होते गये …

वो महफ़िलों का दौर छूटा ,
बाज़ार की तफ़री भूल गये ,
मेहमानों का ताँता क्या रुका,
हम व्यंजनों की तासीर भूल गये ….

छुट्टियों की तारीख़ और बुकिंग ,
वो यात्राओं पर जाना छूट गया ,
कपड़े सिलाने और दर्ज़ी के नखरे,
सैर सपाटे का सिलसिला टूट गया ….

जन्मदिन शादी त्योहारों के उत्सव पर
अपनों से मिलने पर ताला लग गया ,
जिन्हें ज़िन्दगी का हिस्सा समझा ,
उनसे दूर रहने का फ़ैसला सुनाया गया …

आलिंगन को लग गई ऐसी नज़र ,
अनदेखी लक्ष्मण रेखा में बंध गये …!
महीनों से मित्रों और रिश्तेदारों
की शक्ल देखने को तरस गये …!!

सहपाठी सहकर्मी सहेलियाँ छूटी,
महामारी में तो रोज़गार भी छूट गये ..!
कुछ कह सुन कर दूर गाँव लौट रहे
कुछ न लौटने को जग ही छोड़ गये !!

हर रिश्ते का महत्व अब समझ आ रहा ,
बाई दूधवाला अपनी क़ीमत बता गया !
सब्ज़ी हो या राशन अब ख़ास लग रही,
ज़रूरी चीजों का मोल पता चल गया!!

सबकी अपनी अपनी करोना कथा बन रही ,
किसी को एकान्त किसी को घर का काम भारी पड़ गया !!
घर बैठे पढ़ाई न खेल न छोटी छोटी लड़ाई ,
बच्चों का तो मानो बचपन ही लुट गया..!!

पतझड़ सदा नहीं रहता फिर बहार आयेगी ,
इस आस और उम्मीद में साल निकल गया !!
वैक्सीन का बनना और लगना सूर्योदय है पर ,
मास्क और दूरी ज़िन्दगी का चलन बन गया !!

मनोरंजन के साधन से मन नहीं बहलता ,
हवा की शुद्धता पर प्रश्न चिन्ह लग गया ..!
प्रतियोगिता प्रतिस्पर्धा लक्ष्य गुम हो रहे ,
जान है तो जहान है मूल मंत्र हो गया ..!

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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