लघुकथा : पालने में जीवन रेखा -चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

पालने में जीवन रेखा
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‘तो फिर क्या सोचा जीवन तुमने…..तुम्हारी हामी के बिना मैं भी किसी निर्णय पर नही पहुँच पा रही हूँ ।’ रेखा ने बहुत ही प्यार भरे अंदाज से जीवन से पूछा..
“प्रकाश भाऊ की बेटी कल डिस्चार्ज हो रही हैं पूरे एक महीने बाद संयमित हुई हैं उसकी साँसे …तुम चाहो तो मेरी बंजर गोद हरी हो सकती है…तुम्हारी एक हाँ तुम्हे भी पिता बनने का गौरव दिलवा सकती है…’
‘नवजात बेटे को लेकर प्रकाश भाऊ भी बहुत चिंतित है…एक तो उसके जन्मते ही किरण ने दम तोड़ दिया…ऊपर से उनके माता पिता ने भी बच्ची पर मनहूस का ठप्पा लगाते हुए उसे अपनाने से इंकार कर दिया।’
‘अब ईश्वर की मर्जी के आगे उस बच्ची का भला क्या दोष…कल आये तो कह रहे थे मुझसे….आपसे और माँजी से पूछने के लिये । हमें आज ही किसी निर्णय पर पहुँचना होगा।’
‘तुम्हारी तरह मैं भी चिंतित हूँ रेखा…उस दिन से ही जिस दिन किरण ने प्रकाश की बाँहों में अंतिम साँस ली थी..मेरे सामने ही।वह बेचारी तो बेटी का मुँह भी नही देख पाई और बिदा हो गई…झेल नही पाई बेचारी ऑपरेशन की पीड़ा…और प्रकाश की मम्मी के ताने..’
‘तुम्हारी तरह मैं भी तो चाहता हूँ हमारे आँगन में उछलकूद हो…किलकारियाँ गूंजे…तभी तो तुम्हे *पालना घर* खोलने की अनुमति देकर माँ बाबूजी ने भी इस आँगन को आबाद करने में दिल से सहयोग किया है..।’
‘वो तो ठीक है जीवन पर इस विषय में माँजी की भी स्वीकृति जरूरी है न…वह अपनाएंगी बिन माँ की बेटी को…बेटा होता तो शायद ….तुम एक बार माँजी से भी पूछ लो न..’
जीवन कोई जवाब देता इसके पहले ही दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी…माँजी थी…खाली पालने को धीरे-धीरे धकेलते हुए भीतर आ गई थी वह…’बहू तुमने ऐसा कैसे सोच लिया कि,मैं बेटी को अपनाने से इंकार के दूँगी ….बेटियाँ अभागी नही होती बहू …अभागे होते हैं वह माँ बाप जो बेटा बेटी में फर्क करते हैं ….’
माँजी भावना में बहती ही जा रही थी…”बच्चों मैं तो बारह सालों से इस *पालने* को झुलाने की प्रतीक्षा कर रही हूँ…. ये देखो हर साल मैं इनमें एक घुँघरू बढ़ा देती हूँ… देखो…देखो…कितनी मधुर झंकार है इनकी…अरे मैंने तो लोरियाँ भी कंठस्थ कर रखी है …ले आओ बिटिया को घर और डाल दो इस सूने *पालने* में…..।” कहते कहते वह ज्यों ही लड़खड़ाई *जीवन रेखा* ने उन्हें अपनी बाँहों में समेट लिया….। खुशी के मारे सभी की डबडबाई आँखे *पालने* को झुलाये जा रही थी…और घुंघरुओं की आवाजें वातावरण की खामोशी को तोड़ने में कामयाब हो रही थी…।
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चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. बहुत-बहुत बधाई आदरणीय🙏🙏🙏🌹🌹🌹🙇🙇🙇

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