काव्य भाषा : कुंडलियाँ भी जायेंगी पलट -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

कुंडलियाँ भी जायेंगी पलट

आशा का दीप जलाये रख
जैसा है समय,वही तूँ चख
तम तो हटना ही है एक दिन
तूँ रह, जीवन्त,और न थक

समय का पहिया,चलता रहता
नदिया का जल बहता रहता
दिन,रात हैं आते और जाते
ब्रज,समय,बदलता है करवट

कोई मन्जिल न दूर कभी
परबत भी छोटा,करता इंसाँ
मुट्ठी में बँधेंगे, एक दिन कष्ट
कुंडलियाँ भी जायेंगी पलट

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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