काव्य भाषा : माँ तो मिश्री की डली है – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

माँ तो मिश्री की डली है

उस आँचल की छांव भली है
जिसमें हमारी रूह पली है।
जीवन पथ पर हर सफर में,
दुआ उसी की सँग चली है।

उसने हर डग उंगली थामी
चाहे आये कई सुनामी ।
हर विपदा से हमें बचाया ,
जी करता उसे दें सलामी ।

हममें चाहे जहर हो कितना,
वो तो मिश्री की डली है ।

हमें चखाये सुख के निवाले,
झेले खुद पर दुख के छाले।
थपकियों से दिया हौंसला,
उड़ने को दिए पर मतवाले।

काँटो की शैय्या पर ममता,
मुस्काती सी एक कली है।

माँ जैसा कोई और नही है,
उस जैसी कोई भोर नही है।
एक सूत्र में बांध लें सबको,
माँ जैसी कोई डोर नही है ।

चीर के सीना जब भी देखो,
बच्चों के प्रति खलबली है।

हमने ही कभी मोल ना आँका,
दिल में उसके कभी न झाँका।
व्यस्त रहे अपनी दुनिया में,
अस्त व्यस्त हुआ जीवन माँ का।

अब पछताने से क्या है हासिल,
सांझ उम्र की ढ़ली ढ़ली है।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

4 COMMENTS

  1. वाह आदरणीय, हर ममतामयी आँचल को समर्पित एक बहुत ही सुंदर रचना, सादर बहुत-बहुत बधाई💐💐💐

  2. वाह-वाह !
    मां के त्यागमयी जीवन और ममता को अर्पित
    और अंत में हमें हमारे कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करती एक बहुत ही उम्दा रचना।

    👏👏👏💐💐💐👏👏👏

  3. बहुत सुंदर कुकरेजा साहब। मातृ दिवस पर कविता बहुत मार्मिक। धन्यवाद।

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