काव्य भाषा : ज़िन्दा लाशों की बस्ती में ईमान जगाने निकला हूँ – मनोज कान्हे ‘शिवांश’ इंदौर

ज़िन्दा लाशों की बस्ती में
ईमान जगाने निकला हूँ

सावन के झुलों पर गीत लिखो,
श्रँगार मुबारक हो तुमको,
प्रियवर के यादों- वादों की,
हर बहार मुबारक हो तुमको,,।

मै समय के क्रूर कहर मे,
आँसूं लिखने निकला हूँ, ,,,
घायल मानवता की मै,
पीड़ा लिखने निकला हूँ, ,,,,।
मै कलम का पहरेदार हूँ
करूण गाने निकला हूँ,,,,,
ज़िन्दा लाशों की बस्ती में,
ईमान जगाने निकला हूँ ।

गली गली है मातम पसरा,
शहर वीरान दिखाई देते है,
अब तो सारे बाग बगीचे,
शमशान दिखाई देते है ।
नेता-मंत्री, कुर्सी के लोभी,
मानवता को नोच रहे,
और स्वारथ के अंधे सारे,
लाज शरम भी बेच रहे ।
अंधकार के इस आलम में,
इक दिप जलाने निकला हूँ,
ज़िन्दा लाशों की बस्ती में,
ईमान जगाने निकला हूँ ।

जिस दिन से देखा मैने,
मंज़र टूटती सासों का,
जब से मेरी आखों ने देखा,
क्रंदन माता-बहनों का ।
कहीं मिटा सिन्दूर माँग का,
कहीं माँ की गोदी उजडी है,
कहीं साया सर से उजड़ा,
बहना भाई से बिछड़ी है ।
तब से गीतों मे अपने,
मै आहेँ बुनने निकला हूँ,
ज़िन्दा लाशों की बस्ती में,
ईमान जगाने निकला हूँ ।

कब तक टूटती सासों की,
हम गिनती गिनते जाएंगे,,,,?
कब तक घुटते अरमानो की,
हम अर्थी ढ़ोते जाएंगे,,,,?
कब तक लालच की मंडी में,
हम लाशों का मोल लगाएँगे,,,,?
और स्वार्थ के दल-दल में,
कब तक गोते खाएंगे,,,,?
सांसे गिनती मानवता मे
नव प्राण फूंकने निकला हूँ,,
ज़िन्दा लाशों की बस्ती में,
ईमान जगाने निकला हूँ,,,,!!!!

@मनोज कान्हे ‘शिवांश’
इंदौर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here