काव्य भाषा : मजदूर – सीमांचल त्रिपाठी सूरजपुर

मजदूर

माथे पर पसीना,
चमके जैसे नगीना ।
करती श्रम अपार,
रहे कोई भी महिना ।।

तन ढकने ठीक,
से हैं कपडे नहीं ।
साज और श्रृंगार,
वह जानती नही ।।

बांध बच्चा पीठ पे,
करती वह मजदूरी ।
प्रतिदिन करना काम,
है उसकी मजबूरी ।।

दिन-दिन धूप मे करे,
वर्षा गर्मी से ना डरे ।
अथक मेहनत वो करे,
हंसी-खुशी से है परे ।।

खुद भूखी रहकर वह,
बच्चों को है खिलाती ।
खुद गिले मे भी रहकर,
सुखे मे है उन्हे सुलाती ।।

सीमांचल त्रिपाठी
सूरजपुर

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