काव्य भाषा : विषाणु मुक्त मिले जहाँ शुद्ध अब पवन -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

विषाणु मुक्त मिले जहाँ शुद्ध अब पवन

मन ,ढूंढता है अब
नव ,विशाल गगन
विषाणु मुक्त ,मिले
जहाँ,शुद्ध अब पवन

मन हों ,निर्भय सब
न हों, सशंकित जन
न हों दूर ,तन मन से
अब ,निज ही जन

सड़कें न हों वीरान
जीवित दिखें शहर
दिन,रात,अपने लगें
विषाणु का न हो कहर

खेलता ,दिखे बचपन
हो श्रृंगार करता ,यौवन
फूलों पर ,उड़ें भ्रमर
हों सुबासित, रंगीं उपवन

उत्सव, जहाँ सज सकें
बज सकें ,शहनाइयाँ
सौंदर्य,मुस्कुराता हो
लेता हो ,अंगड़ाइयाँ

कब ,वह सुबह आयेगी
मन को, जो लुभायेगी
कब शहर ,सजेंगे फिर
या ,बने रहेंगें ,लाश घर

मन, ढूंढता है, चहल पहल
दिखें, कर्म रत ,जन सभी
विवशता हों, दूर सबकी
ब्रज,क्या, वक्त आएगा अभी

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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