काव्य भाषा : प्राणवायु की आस – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

प्राणवायु की आस
★★

जीवन की रणभूमि में
अनेकों लक्ष्मण आज मूर्छा में हैं…
भेद दिया है
असमय ही
काल ने इनका सीना
विषाणु युक्त बाण से….।

अनेकों राम दुःखी हैं
आज अपने अनुजों की इस मूर्छा से।
कर रहें पूरे अंतर्मन से
इनकी थमी हुई साँसों को
गति देने का प्रयास।

अनेकों हनुमंत
जाने कितनी रुकावटों के बावजूद
आज मीलों लंबा सफर तय करके
कर रहे हैं
मूर्छित होते जा रहे जीवों को
प्राणवायु देने के लिए
ओषधि का प्रबंध….।

चारों तरफ मची हुई है अफरा तफरी..
लगाए हुए हैं सब आस प्रभु से
कर रहे हैं प्रार्थनायें
अपनी-अपनी इबादतगाहों में…।
हे ईश्वर,
माफ कर दे अपने सुतों के गुनाह…
थाम ले हे प्रभु,
मंझधार में हम सबकी बाँह…।
कर कृपा परमात्मा
मत कर समय से पहले
अपने ही भेजे प्राणियों की
जीवन लीला समाप्त…।
दिखा दे अपनी लीला
और समाप्त कर
धरती पर अकारण ही छिड़ा हुआ मौत का भयानक युद्ध…।
बजा रणभेरी
रोक दे काल का पहिया
दे दे हम सबको
एक बार फिर से जीवनदान
ताकि,
कर सकें हम तेरे चरणों में नतमस्तक हो कर
पूरे अंतर्मन से पश्चाताप…।

हे सर्वेश्वर
फूंक दे फिर से प्राण
हमारे मूर्छित होते जा रहे आत्मबल में…।
सच मानो
पूरी तरह टूट चुका है अब
हमारा अभिमान…।
सच में भगवन
जाग चुका है अब
हमारे भीतर फिर से नेक इंसान..।

हे राम,
हो चुका है पूरी तरह
हमारे भीतरी अह्म की लंका का दहन…।

हे राम
हो जाओ न फिर से स्थापित
हमारे पवित्र हो चुके ह्रदयों में..
लौटा दो न फिर से हमें
वही सुहानी भोर..
जहाँ सुनाई दे हमें सिर्फ
आजाद पंछियों का शोर।

हे प्रभु
तोड़ दो न अब सारी बंदिशें
गुंजा दो न फिर से
मंदिरों में शंख ध्वनि
मस्जिदों में अजान
गुरुद्वारों और गिरजाघरों में
आराधना का ज्ञान…।

हे प्रभु
करो न अपने बंदों पर रहम..
पार कर दो न अब तो
हमें हर मझधार से….।
ताकि,
दूर हो हमारी मूर्छा
तेरी इक प्यार भरी पुचकार से।
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चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

2 COMMENTS

  1. बहुत ही सुंदर रचना आदरणीय, सादर नमन एवं ईश्वर आप की प्रार्थना अवश्य सुनेगा व हम सभी डरे हुए मनुष्यों को फिर से जीने की नव शक्ति व नव ऊर्जा प्रदान करेगा, ऐसा अटल श्रद्धान।
    जय जिनेंद्र, जय श्री राम🙏🙏🙏🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙇🙇🙇

  2. स्थापित प्रतिमानों और सनातन आस्थाओं के संबल को पूरी शिद्दत से थामे ह्रदय की असीम गहराइयों से निकली हुई एक सच्ची प्रार्थना।
    आमीन।

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