विविध : समाज निर्माण में साहित्य की भूमिका – आशुतोष तीरथ गोण्डा

विविध
समाज निर्माण में साहित्य की भूमिका

     किसी राजनीति शास्त्री ने कहा है “यदि इतिहास से राजनीति को निकाल दिया जाए तो केवल साहित्य बचेगा।”
 अर्थात इतिहास और साहित्य के मेल से राजनीति का जन्म होता है। राजनीति का वास्तविक लक्ष्य मानव मात्र की भलाई है। मानव की भलाई का जो मैग्नाकार्टा है उसे ही साहित्य कहा जाता है।

कुछ सौ वर्षों पहले राज्य का कोई निश्चित संविधान न होकर इनके कानून धार्मिक पुस्तकों पर आधारित हुआ करते थे। इन पुस्तकों का स्तर इतना उच्च था कि लोग इनके विचारों को बाध्यता अथवा डर से मानने के स्थान पर श्रद्धा से स्वीकार करते थे।

  आज जो इतिहास है वह भूतकाल का साहित्य है। उसी साहित्य के बलपर आज हम हजारों वर्षों की बातों को जानते समझते हैं। उस समय साहित्य से कोई भी विषय अछूता नहीं था। “महाविष्फोटक सिद्धांत” जो बीसवीं शताब्दी में परिभाषित किया गया , वह सिद्धांत साहित्य में कहीं दो हजार वर्ष पहले ही “सूर्य प्रफुष्टित सिद्धांत” के रूप में वर्णित है।

रामचरित मानस एक ऐसा साहित्य है जिसने श्री राम चन्द्र जी को घर घर पहुंचाया यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज श्री राम चन्द्र जी को लोग तुलसीदास जी की वजह से समझते हैं। यदि तुलसीदास न होते तो यह संभव नही था कि श्री राम घर घर पूजे जाएं ।

सामाजिक परिवर्तन की सबसे पहले किसी विषय ने बेड़ी उठाई तो वह साहित्य ही था पुरातन समय मे साहित्य विचारों के आदान-प्रदान प्रदान का एकमात्र साधन था। मध्ययुग हो अथवा भारत की आजादी के उमड़ते बादल इनमें साहित्य का उतना ही योगदान था जितना शस्त्रों का।
प्रसाद जी की अब जागो जीवन के प्रभात भारतेन्दु जी की भारत दुर्दशा । यहाँ सभी का वर्णन करना असंभव है ।

इक्कीसवीं सदी के पहले का जितना भी साहित्य है वह आज भी हमारे जीवन में सदैव सतत गणित के नियमों की तरह सटीक बैठ रहा है। वर्तमान समय में साहित्य में कुछ विचलन प्रतीत होती है। आज लेखन सम्मान और आत्मसंतुष्टि तक ही संकुचित होता जा रहा है। जो सूर्य उगता है वह अस्त भी होता है परन्तु साहित्य के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ साहित्य वह सूर्य है जो केवल उगा है अस्त नहीं। बस कई बार बदली घेर लेती है, यही बदली वर्तमान में छाई हुई है। बदली की आयु बहुत नहीं होती ।

आशुतोष तीरथ
   गोण्डा

1 COMMENT

  1. उचित कह रहे हैं। साहित्य मनुष्य की अभिव्यक्ति है, जीवन है। राजनीति भी उसमें समाहित है। बहुत सुंदर लेख। बधाई।

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