लघुकथा मानव मूल्यों की संकल्पना को सतत तराशने का प्रयास करती है

लघुकथा मानव मूल्यों की संकल्पना को सतत तराशने का प्रयास करती है

नगर की साहित्यिक संस्था *क्षितिज* के द्वारा एक आभासी लघुकथा गोष्ठी आयोजित की गई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ज्योति जैन ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि ,”आज लघुकथा हिंदी की सबसे चर्चित और विवादास्पद साहित्यिक विधा है । चर्चित इसलिए कि वर्तमान समय की सभी पीढ़ियों के लेखक इसे निसंकोच स्वीकार करते हैं। विवादास्पद इसलिए कि जब भी साहित्य में किसी नई विधा ने जन्म लिया और कुछ कदम चलकर अपना आकार बुना तो परंपरागत विधाओं के लेखक उसे हेय दृष्टि से देखने लगे। लघुकथा के साथ भी आरंभ में ऐसा ही हुआ। ऐसा हिंदी में पहली बार नहीं हुआ। आधुनिक हिंदी की विधाओं के उदभव और विकास का इतिहास जिन्होंने पढ़ा है, वह जानते हैं कि जब भी किसी नई विधा को नया रूप देने का प्रयास होता है, उसे कठिन विरोधों का सामना करना पड़ता है। हमें समझना होगा कि नवीनता समाज व साहित्य को गति प्रदान करती है, नई पीढ़ी को सार्थक और ऊर्जावान बनाती है। लघुकथा के चर्चित होने के मूल में यही कारण है कि पिछले तीन दशकों में युवाओं ने अपनी रचनाधर्मिता का मूल आधार लघुकथा को बनाया है।”

उन्होंने कहा कि , ‘लघुकथा कहानी का संक्षिप्त विवरण मात्र नहीं है ।वस्तुतः वह ऐसी त्रिआयामी लघु रचना कही जा सकती है जिसमें एक ओर व्यक्ति तथा समाज के द्वंद की अभिव्यक्ति रहती है वहीं दूसरी और अतीत व वर्तमान के संघर्ष की अनुगूंज और तीसरी त्रिज्या मानव मूल्यों की संकल्पना को तराशने का सतत प्रयास करती है। वर्तमान समय में लेखन केवल पाठकों के लिये नही, श्रोताओं और दर्शकों के लिये भी लिखा जा रहा है। इसलिये हम अपने लेखन के अलावा उसके प्रस्तुतिकरण को लेकर भी सचेत रहे, यह समय की मांग है। आज साहित्य अनेक तरीकों से अपने लक्ष्य तक पहुंच रहा है। इन सारे माध्यमों की बेहतर जानकारी और अपने आप में संबंधित बदलाव करना आज हमारे अस्तित्व के लिये आवश्यक हो गया है।’

इस कार्यक्रम में चर्चाकार के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री अंतरा करवड़े और वरिष्ठ साहित्यकार श्री संतोष सुपेकर उपस्थित थे। इस गोष्ठी में राममूरत राही ने सेल्फी, जितेंद्र गुप्ता ने आखिर क्यों ? , चंद्रा सायता ने शब्दवध, विजय सिंह चौहान ने स्वामिनी, आर.एस. माथुर ने प्रदर्शन, विनीता शर्मा ने आत्मसंतोष, सीमा व्यास ने अपना-अपना रिवाज़, आशागंगा शिरढोणकर ने ऐसा कैसे, कोमल वाधवानी “प्रेरणा” ने नीयत, दिलीप जैन ने रिश्तों का भविष्य, दिव्या शर्मा ने ्नमो नमः, कनक हरलालका ने अधूरा सच, हनुमान प्रसाद मिश्र ने हे राम !, पवन शर्मा ने डूब की ज़मीन का दु:ख, पवन जैन ने बाज़ारवाद लघुकथाओं का पाठ किया। इस

सुश्री अंतरा करवड़े ने लघुकथा पर चर्चा करते कहा कि,” हमने हमेशा से यह सुना है कि समर्थ रचना अपने पाठक खोज ही लेती है। यह एक सीमा तक सही है। लेकिन आज के समय को देखें, तो आज जैसा काल कभी भी सामने नही आया है। अब ये हमारा कर्तव्य है कि हम काल के अनुसार अपने नवीन सिद्धांतों को गढ़ें। इसलिये यह आवश्यक है, कि संख्यामक के स्थान पर गुणात्मक हो सके। इस समय को लेकर रचा गया साहित्य, विभाजन के समय की त्रासदी के समान, विश्व युद्ध की विभीषिका के समय के समान ही प्रासंगिक रहेगा। इसलिये हमारा एक एक शब्द हमारे कर्तव्य के समान बन जाता है। गंभीरता की आवश्यकता है और गहराई की भी।”

सीमा व्यास की अपना-अपना रिवाज…. एक मां के दो बेटियों की मिट्टी के खदान में धंस कर मृत्यु हो गई हैं अत्यंत त्रासद लघुकथा का अंत हमें अनेक प्रश्न पूछता है मन को झिंझोडता है पेट का रिवाज आजीवन जस का तस बना रहता है मार्मिक सर्वहारा वर्ग के मूल समस्या उठाते उत्कृष्ट लघुकथा। इस वर्ग को भूख के सामने दुख शोक मनाने का रिवाज भी नसीब में नहीं होता। यहां पर यशपाल जी की ’दुख का अधिकार’ कथा भी समानांतर रुप से सामने आती है जिसमें तरबूज बेचने वाली महिला का युवा पुत्र नही रहा परंतु उसे शोक का अधिकार नही, उसे काम करना ही है। पवन शर्मा की लघुकथा डूब की जमीन का दुख ह्रदय विदारक चित्रण प्रस्तुत करती है। सच है बांध बनते हैं बड़ी-बड़ी जल परियोजनाएं बनाई जाती है लेकिन डूब क्षेत्र के निर्वासित लोगों का दुख किसी को दिखाई नहीं देता उनके आंसू उनका रोना उनके अभाव उनके जीवन में छाया अंधेरा विस्थापितों की हूक आदमखोर जश्न में गुम हो जाती है। बेहद संवेदनशील लघुकथा …. बावजूद इसके, थोड़ा सा और संपादन इसमें कसावट ला सकता है। कनक हरलालका की अधूरा सच – किसान आंदोलन की राजनीति दिखावा पर चोट करती लघु कथा है। यह सच है कि हमारी पहचान किसान से है लेकिन पहचान को तरसने वाले भी आज की तारीख में किसान ही है। विड़ंबना को प्रस्तुत करती लघुकथा है। दिव्या शर्मा की नमो नमः स्त्री सशक्तिकरण का उत्तम संदेश देती प्रेरक सकारात्मक रचना है। हिंसा, अहिंसा, तुल्य, अतुलनीय आदि शब्दों के साथ अबला शब्द का नवीन अर्थ अभिव्यक्त करती लघुकथा है। अबला का यह नवीन अर्थ यदि समाज में व्यक्त होता है तो रचना की सार्थकता सिद्ध होगी। चंद्रा सायता जी की लघुकथा शब्दवध वर्तमान समाज की तथाकथित आधुनिकता के चरम बिंदु को दर्शा रही है शब्द वध करके फिरंगी जुमले का स्वीकार्य हमारे सामाजिक जीवन मूल्यों का कितना ह्रास कर रहा है इस पराकाष्ठा को दर्शाती लघुकथा है।

दिलीप जैन की रिश्तों का भविष्य चिंतनीय लघु कथा समाज में आज रिश्ते किस तरह दिख रहे हैं बच्चे रिश्तो के नाम संबोधन से अनभिज्ञ हो रहे हैं यह कितनी बड़ी सामाजिक विडंबना है ! बावजूद इसके, यह परिस्थिति के एक पक्ष को दिखाती है, यह स्थिति आई है यह सही है लेकिन क्यों आई है इसपर चिंतन भी आवश्यक है।

आर. एस. माथुर की प्रदर्शनरा राजनीति के वर्तमान स्वरुप जिसमें किसानों की प्रत्येक पक्ष की ओर से उपेक्षा हो रही है, उसे यह लघुकथा दिखाती है। किसान लंबे समय से जवाब की प्रतीक्षा में है और उसके पल्ले हमेशा ही मौन आया है। पवन जैन की बाजारवादव वर्तमान समय में दो पीढ़ियों के मध्य सोच के अंतर को मुखर करती है यह लघुकथा। इसके पार्श्व में महामारी की भयावहता चलती है और मन भूतकाल में भी रमता है। अधिकांश लोगों को यह अपनी सी लगेगी। राममूरत राही की सेल्फी हम जो परिभाषित करते हैं, जो सांचा बनाते हैं, वही हमेशा सही रहे यह आवश्यक नही है। राममूरत राही जी की लघुकथा अपने सत्य का अन्वेषण करने का मार्ग प्रशस्त करती है। इस लघुकथा में संवादों को थोड़ा कसावट के साथ प्रस्तुत कर दिया जाए, तो यह निसंदेह उत्कृष्ट की श्रेणी में है।

कोमल वाधवानी की नीयत एक गृहिणी के नन्हे से जग में जहां काम का बोझ उसे सिर उठाने नही देता, वो पक्षियों को भोजन करवाने के दौरान भी जीवन की सृजनात्मकता को कैसे जी लती है, इसका बेहतर उदाहरण है। कड़ी धूप में नीम की छांव सी लघुकथा।

जीतेन्द्र कुमार गुप्ता की आखिर क्यों आस्था और विश्वास को लेकर रची गई इस लघुकथा में प्रश्न जिस शिद्दत से उठाया गया है, उतनी ही आवश्यकता इसके उत्तर भी खोजने की है और सभी के उत्तर अलग अलग हो सकते हैं। यह लघुकथा आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेगी।आशागंगा शिरढ़ोणकर की ऐसा कैसे लघुकथा में संवेदनाएं, प्रवाह और कथा तत्व का अच्छा बहाव देखने को मिलता है। संयोग हो या न हो परंतु यह सही है कि कुछ दुख हमेशा हरे रहते हैं! एक अच्छी लघुकथा।हनुमान प्रसाद मिश्र की हे राम यह मानव जाति के लालच पर तंज कसती लघुकथा है। अंतिम वाक्य काफी मारक और महत्वपूर्ण है। विजयसिंह चौहान की लघुकथा स्वामिनी में स्त्री विमर्श में इस प्रकार के प्रश्नों से बारीक ताना बाना बुना गया है। एक बार फिर से, प्रश्नों के साथ यदि हम समाधान भी दे सके, तो कर्तव्य निर्वहन का संतोष भी मिलता है। शब्दों का चयन अच्छा है। विनिता शर्मा की आत्मसंतोष संवाद शैली में लिखी हुई यह लघुकथा काफी कुछ अभिव्यक्त करती है। इसमें थोड़ा सपाटबयानी से बचकर संवादों में रोचकता रखी जाए, तो इसका स्तर गई गुना बढ़ सकता है।

श्री संतोष सुपेकर ने लघुकथा पर चर्चा करते हुए कहा कि,” लघुकथा ,अंतर्मन को आंदोलित कर देने वाली ,जीवन की विसंगतियों को उजागर करती, साहित्य जगत की प्रमुखतम विधा है।जो सूक्ष्म है,जो सार्थक है, जो जीवन के क्षण विशेष को चित्रित करे वही लघुकथा है।हर विधा की तरह लघुकथा में भी विवेचन ,विश्लेषण अत्यावश्यक है। सांगोपांग विवेचन ही सृजन की बारीकियों को उजागर कर सकता है।रचनाओं के गुण दोष पर गहन विश्लेषण सृजन के प्रासाद में नई सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। आज के कार्यक्रम में प्रस्तुत रचनाओं को सुनकर लगता है कि हमारे लघुकथाकार सामयिक रूप से अत्यंत सचेत हैं, लघुकथा चैतन्य हैं। विषय वैविध्य उन्हें आकर्षित करता है, तभी वे लिव इन रिलेशनशिप,नारी शक्ति,किसान आंदोलन ,सड़े हुए रिवाजों के प्रति आक्रोश,संयुक्त परिवार का महत्व, बाज़ारवाद , श्रम का सम्मान, कोरोना काल की कठिनाइयों , हड़प की अपसंस्कृति जैसे अनेक ज्वलन्त विषयों पर सफलतापूर्वक लिख रहे हैं।”

डॉ बलराम अग्रवाल ने लघुकथा को समाज के जोड़ों में हो रहे दर्द का आख्यान यूं ही नही कहा है।वरिष्ठ लघुकथाकार श्री पवन शर्मा इस तथ्य को भलीभांति जानते हैं तभी वे विकास के नाम पर अंधाधुंध हो रहे निर्माण और फलस्वरूप डूबी हुई जमीन की व्यथा को ‘डूब की जमीन का दुःख’ में गहराई से व्यक्त करते हैं।

गूंगी-बहरी व्यवस्था के प्रति कथा नायक का आक्रोश,मुआवजा न मिल पाने का गम ,निराशा की स्थिति में उसका अपने आप से संवाद करना ये सभी तथ्य इस रचना को बहुत सशक्त बनाते हैं।

लघुकथा को प्राणवायु प्रदान करने हेतु उसमें नए विषयों का प्रवेश बहुत जरूरी है। कनक हरलालका ने ‘अधूरा सच’ और आर एस माथुर ने ‘प्रदर्शन ‘के द्वारा वर्तमान में देश मे चल रहे किसान आंदोलन की ‘सार्थकता'(!) पर अच्छे प्रश्न उठाए हैं।’अधूरा सच ‘मे छोटे किसान की अभिव्यक्ति -*भविष्य का तो पता नही*बहुत गहरा अर्थ लिए है।’प्रदर्शन’ में भेड़चाल और अपने रोलमॉडल की बात मानकर बिना सोचे कुछ भी करने पर करारा व्यंग्य है।इसका शीर्षक ‘पता नही ‘होना चाहिए था।

संवेदनशील रचनाकार दिव्या शर्मा की लघुकथा ‘ नमो नमः’ स्त्री विमर्श के दौर की ,शब्दों की शल्यक्रिया करती रचना है जो नारी शक्ति के स्तवन का संदेश देती है।इसमे ‘मधु की छोटी बहन आर्या ने प्रश्न किया ‘के स्थान पर ‘आर्या ने प्रश्न किया ‘कर दिया जाए तो ठीक रहेगा।

अंग्रेजी के लुभावने शब्द ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के भ्रमजाल में आज नैतिकता फिर ताक पर रख दी गई है । चंद्रा सायता ‘शब्द वध’ के द्वारा इसी कटु सत्य को सामने लातीं हैं लेकिन मित्र की पत्नी के साथ अभिभाषक का विचित्र व्यवहार दुविधा उत्पन्न करता है।रचना में ‘नीला का मन आसमान की स्याही सा हो रहा था’वाक्य उल्लेखनीय है।

सतीश राठीजी के अनुसार लघुकथा जीवन की तमाम क्रूर विसंगतियों पर वजनदार चोट करने में सक्षम होती है ।ऐसी ही एक विसंगति है टूटते,बिखरते रिश्ते।सिमटते,छोटे परिवारों के बच्चे काका ,मामा जैसे नाम ,रिश्ते नही जानते ।दुर्भाग्यपूर्ण है कि कक्षा में ऐसी ही बात निकलने पर आज ,छोटे नही ,बड़े परिवारों के बच्चे कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। ‘रिश्तों का भविष्य’के द्वारा दिलीप जैन एक नए विषय को सामने लाए हैं।एक बहुत प्रभावी लघुकथा के लिए उन्हें बधाई।रचना का शीर्षक ‘हीनता का बोध’ होता तो सोने में सुहागा हो जाता।

बुढापे में पुरानी वस्तुओं से प्यार हो ही जाता है ।नई टेक्नॉलजी ,नया सामान ये सब वृद्धों को फिजूल सा लगने लगता है।सशक्त संवादों के द्वारा पवन जैन जी अपनी लघुकथा ‘बाजारवाद’ को प्रभावी बनाते हैं। अपने अंडरकरंट से रचना यह भी दर्शाती है कि भावनाओं में भी बाजार की घुसपैठ हो चुकी है।सब कुछ ऑनलाइन हो जाने से बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा ,सम्मान ,नम्रता जैसी भावनाएं आज ऑफलाइन होती जा रहीं हैं।

स्थितप्रज्ञता का अनुपम उदाहरण है सीमा व्यास की लघुकथा ‘अपना अपना रिवाज’ ।लेखिका ने उपयोगी प्रश्न उठाया है कि परिवार मे हुई मौतों के बाद अत्यंत निर्धन परिवार का पेट भरने घर की महिला बाहर निकले या रीति रिवाज निभाने ,मातम मनाने का दिखावा करते हुए दस दिन तक घर में ही बैठी रहे ?निर्धन कथा नायिका, Let bygones, be bygones की कहावत को अच्छे से समझाती है।’समाचार सुनने वालों का दिल दो मिनट दहला,तीसरे मिनट फिर सामान्य।’सौंदर्यबोध युक्त शानदार भाषा शैली।

कोरोना काल की विभीषिका को उजागर करती, सड़े गले रीति रिवाजों पर चोट करती एक अन्य लघुकथा जितेंद्र गुप्ताजी की ‘आखिर क्यों ‘भी है जिसमे कथा नायक का आक्रोश ,सड़े-गले रिवाजों के आगे हथियार डाल देता है।

अंतिम वाक्य “उसका ‘आखिर क्यों’फिर कहीं दम तोड़ चुका था।”आकर्षित करता है। थोड़े प्रयासों से इस लघुकथा को सकारात्मक भी बनाया जा सकता है।

मिल बाँटकर खाने की ‘सर्व जन हिताय ,सर्व जन सुखाय’प्रवृत्ति पर ध्यान गया है कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’जी का । रोचक संवाद , कोयल और कौए का उदाहरण पाठक को प्रभावित करता है , पर कोयल और कौआ, दोनों का रंग काला होने से सन्दर्भित फिल्मी गीत का कोई अर्थ नही रह जाता।

‘ऐसा कैसे हो सकता है’ में आशागंगा शिरढोणकर ने बेटी के दुख में डूबे पिता के मनोभावों को बेहतरीन चित्रण दिया है।’रचना का शाब्दिक सौंदर्य लाजवाब है- “अथाह वात्सल्यसागर में उठती ममत्व की उत्तुंग लहरें दोनो को सराबोर करती चली गईं।”और “दो जोड़ी जलधारी नैनों से गिफ्टपैक पर अभिषेक होता चला गया।’हालांकि रचना और शीर्षक पर अधिक श्रम की अभी गुंजाइश है।

लघुकथा में मानवेतर पात्र इस अर्थ में उपयोगी हैं कि वे मानव को जल्दी सबक सिखाते हैं ।इसी तथ्य के मद्देनजर हनुमान मिश्रा जी ने हड़पने की संस्कृति को बंदरों के माध्यम से बेहतरीन ढंग से ‘हे राम’ में चित्रित किया है।समय बदलने के साथ बंदरों का भी ‘चाल चरित्र और चेहरा’ बदल गया …लिखकर मिश्राजी ने आज के इंसान की दुष्प्रवृत्तियों पर गहरी चोट की है।

पति की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर गर्वित होती, किंतु घर के बाहर पति की नेमप्लेट देखकर पुनः झटका खाती ,अपने अस्तित्व को तलाशती नारी का चित्रण है विजयसिंह चौहान की ‘स्वामिनी ‘।’समुद्र को एक दिन एहसास हो ही जाता है कि उसके विस्तार में कितनी नदियों का समर्पण है।’और ‘अपने भीतर की नदी में अपना अस्तित्व तलाशने’ जैसे भाषाई सौंदर्य से लबरेज ये कथन लघुकथा को आकर्षण प्रदान करेंगे ही।

विनीता शर्मा की नायिका (आत्मसंतोष) बरसों बाद भी शराब के नशे के दुष्परिणामों से इतनी त्रस्त है ,इतनी आतंकित है कि दूसरे किसी भी नशे को सहन करने को तैयार है पर शराब को ,बिल्कुल नही।लघुकथा अनावश्यक विस्तार की इजाजत नही देती इस रचना में प्रारम्भिक पंक्तियाँ अनावश्यक प्रतीत होतीं हैं।

वीआईपीज,सेलिब्रिटीज़ के साथ ढेर सेल्फी लेने के युग मे पसीने ,धूल, मिट्टी में डूबे श्रमिकों के साथ सेल्फी कौन लेना चाहेगा?सेल्फी लेने के ‘सेल्फिश’जमाने में श्रम को ,अन्नदाता को सम्मान देने राममूरत ‘राही’ एक नई दृष्टि लेकर सामने आए हैं। मजदूर दिवस के ठीक पहले आयी यह लघुकथा श्रम शक्ति को नमन करती है। इस रचना की गहन संवेदना ,चेतना को स्पंदित कर देती है।रचना का प्रारम्भ यदि संवादों से होता तो अधिक प्रभावी होता,’एक सिपाही की तरह ‘के स्थान पर कोई और उदाहरण अधिक समीचीन प्रतीत होता।

आज के विवेचित सभी लघुकथाकारों ने कथा प्रस्तुति में यथासम्भव धैर्य से काम लिया है,विषय वैविध्य पर उनका लेखन,लघुकथाओं में भाषाई सौंदर्य का अनूठा प्रयोग,व्यंग्यात्मकता,चुस्त संवाद शैली प्रशंसनीय है जो लघुकथा की परिधि को और विस्तृत करेगा पर लघुकथा की प्रकृति के अनुसार, कुछ रचनाओं में अभी भी भाषा,शिल्प, प्रवाह के स्तर पर अधिक श्रम करने की आवश्यकता है ,अनावश्यक विस्तार से बचा जाए ताकि न केवल लघुकथा का मार्ग सुदृढ हो ,वरन रचना भी कालजयी सिद्ध हो सके। रचना में सम्प्रेषण की तीव्रता और बढ़े,श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम की ओर बढ़ने की तड़प के अंकुर और फूटें ,ऐसी उम्मीद करता हूँ।
इस आयोजन में सर्वश्री सतीश राठी, सुरेश रायकवार, महेश राजा, बालकृष्ण नीमा, सतीश शुक्ल, निधी जैन, मधु जैन, अजय वर्मा,अनुराग आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सुश्री सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ ने किया एवं कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन संस्था सचिव श्री दीपक गिरकर ने किया।

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