काव्य भाषा : ज़िंदगी पहले सा अब हंसती नहीं – प्रो. आर. एन. सिंह ‘साहिल’ वाराणसी

ज़िंदगी पहले सा अब हंसती नहीं

ज़िंदगी पहले सा अब हंसती नहीं
अब तेरी तस्वीर भी जंचती नहीं
कृष्ण राधा सा समर्पण ख़्वाब अब
चाह चाहत से कभी मिलती नहीं

है यहाँ परिदृश्य सब बदला हुआ
स्वार्थ में इंसान है उबला हुआ
रिश्ते भी खोने लगे हैं मूल्य अब
अब कली उम्मीद की खिलती नही

ज़िंदगी की राह कंकरीली हुई
अश्क़ सूखे आँख पत्थरीली हुई
है नहीं अनुमान कुछ भी हश्र का
रोशनी है कि कहीं दिखती नहीं

तुम रहो आबाद दिल से है दुआ
सोचना मत साथ मेरे क्या हुआ
हो मुबारक तुमको तेरी ख्वाहिशें
ख़ुशियाँ तेरे बिन मेरी सजती नहीं

सब्र रखने के सिवा क्या राह है
मन में मेरे आह ही बस आह है
देते हैं हालात हमको सीख ये
नाव साहिल से सदा मिलती नहीं

प्रो. आर. एन. सिंह ‘साहिल’
वाराणसी

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