काव्य भाषा : धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा – डॉ सरोज गुप्ता सागर म प्र

पृथ्वी दिवस पर केंद्रित रचना –

धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा।

अन्नदात्री,प्राणदात्री,धनदात्री मां पराम्बा।
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा।
जगत की है तू पालनहार,
स्वयं में निज का वृहत् आधार।
शैल-गिरि,सिन्धु तरंगायित,
भव्य दिव्य शुभ्र कण्ठ हार।
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—–
हिममुकुट भव्यभाल,
शोभित सूर्य रश्मि उज्ज्वल माल ।
गगन नील अनन्त विशाल,
अरण्य गहन तोरणद्वार।
आर्यावर्त जम्बूद्वीप भूमिसृष्टि
आदि मध्य प्रलयंकार।
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—-
तरु तृण वन,नव-बसन वाटिका,
विटप पल्लव वन्दनवार ।
ध्वनित हो एक ही उद्गार।
माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्या
जागृत हों सबमें ये भाव।
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—-
असीम परिधि, शोभा अनन्त,
अर्वाचीन नवीन प्रताप प्रणत,
कलशघटपूरित अमिय,
हरण पाप ताप संताप।
काल की महिमा तुम्ही से,
वन्दना करुं जीवनाधार।
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—
शेष कुछ बचता नहीं, जन्तु प्राणी विशेष।
गोद में तेरी त्रिभुवन की, सम्पदा निर्विशेष।
धूलभरे आंचल में , स्वर्ण रत्न मोतियों के कोष।
मिले सिन्धु नदी तट को अथाह
मणिद्वीप लिए मोहिनी मुस्कान,
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—
आम्र उपवन में ,कीर कोयल
मदमस्त गाए प्रभाती गान ।
गगन में उड़ते पखेरु,
भुवन को खींच अपनी ओर।
शोर करते भोर में, सोनचिरैया,
काग तोते पपीहे मोर।
सधें सबके सुर मिलन के, विविध मन के तार।
भुवनधात्री,धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा—
धैर्य धरित्री मां,बसुन्धरा।

डॉ सरोज गुप्ता
सागर म प्र

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