संस्मरण : कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे -इंजी. भारतभूषण आर गाँधी

संस्मरण : कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे

जिसके साथ मस्ती भरे दिन गुजरे हों और वो चला जाये तो बहुत दुःख होता है, ऐसा ही दुःख दीपक अपने दोस्तों को दे गया है. ओझा और गाँधी परिवार का परिचय यूँ तो हम दोनों के जन्म से पहले का था लेकिन उससे मेरी मित्रता मेरे इंजीनियरिंग डिप्लोमा करके लौट आने के बाद ज्यादा बढ़ी. घर के सामने ही योगेन्द्र अधिकारी (नंदू) मेरे बचपन का दोस्त था और वो दीपक की मित्र मंडली में था इसलिए नंदू के जरिए दीपक, जीतेन्द्र भावसार, आनंद अवस्थी, रवि जैसवाल आदि के साथ मित्रता बन गई थी. दीपक उनमें अलग और ख़ास था उसे गज़लें बहुत पसंद थी, उससे ज्यादा शायरी पसंद थी, शेर कहना पसंद था, कवितायेँ पसंद थी, नामचीन कवियों की बेहतरीन कविताओं को उन्हीं के अंदाज़ में कहना आता था. कांग्रेस में होने और बहुत सारे गुण होने के बावजूद पब्लिक लीडर तो नहीं बना लेकिन अच्छे अच्छे नेताओं का रणनीतिकार बना.
अपनी पढाई पूरी करके वापस लौटने के बाद बहुत और बहुत सारी मस्ती की थी, लेकिन फिर भी मेरा बहुत ज्यादा समय उन मित्रों के साथ नहीं गुज़रा, यहाँ इटारसी में मेरी पुरानी मित्र मंडली थी, मुझे व्यवसाय भी करना था. लेकिन फिर कुछ सालों बाद एक मौका फिर आया जब मैं केबल टीवी के व्यापार में आगे बढ़ रहा था और एक समय आया जब दोबारा ओझा परिवार के साथ जुड़ा, दीपक मेरा दोस्त था लेकिन पार्टनर उसका छोटा भाई जित्तू बना. जित्तू की कुशाग्रता और मेरी मेहनत ने ओझा गाँधी का साझा ओजी नेटवर्क और ओजी न्यूज़ ने जिले में अपने नाम का परचम लहरा दिया था.
इटारसी बहुत विचित्रताओं का शहर है कभी भी कुछ ऐसा घटित कर देता है बहुत कुछ उलट पुलट कर देता है, ऐसा ही कुछ मेरे और जित्तू के साथ भी हुआ और केबल इंडस्ट्री से हमारा नाता धीरे धीरे छूटता चला गया. लेकिन जित्तू के साथ प्रेम और दीपक के साथ दोस्ती का भाव कभी भी नहीं छूटा. हम लोगों के बच्चे बड़े हो गए। एक एक बच्चे की शादी हो गई, दीपक दादा भी बन गया. पिछले कुछ सालों में उसकी तबीयत बिगड़ी और फिर ठीक होकर वैसे ही सबसे मिलने और सबमें घुलने लगा था. इस कोरोना काल में वो सबको पीछे छोड़ आगे निकल गया जहाँ से उसके आने की अब कोई उम्मीद ही नहीं है. उसके कूच किये पथ पर बस यादों का गुबार ही गुबार है जिसे हम देख रहे हैं.
गोपालदास नीरज की रचनाओं को हुबहू सुनाने वाले दीपक के लिए नीरज का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गया गीत जिसकी सिग्नेचर पंक्तियों “कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे” को दीपक के चले जाने के बाद याद आ रहा है.

इंजी. भारतभूषण आर गाँधी
(स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

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