‘बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा’ – नव संवत्सर आरंभ : आईए मनाएं सृष्टि का जन्मदिन – डॉ. वर्षा सिंह ,सागर

Email

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

नव संवत्सर आरंभ : आईए मनाएं सृष्टि का जन्मदिन
– डॉ. वर्षा सिंह

पिछले 3 माह पहले की बात है, कोरोना आपदा से ग्रस्त वर्ष 2020 को विदा करते हुए जब मन बहुत हर्षित हो रहा था और 1 जनवरी 2021 को मैंने अपने एक मित्र को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं तो प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझसे कहा कि “वर्षा जी, यह नववर्ष तो अपना है नहीं, फिर इस पर शुभकामनाएं कैसी? अपना नववर्ष तो चैत्र माह में मनाया जाता है।”
उन मित्र से मैंने पूछ लिया कि – “जी अच्छा, लेकिन शक या विक्रम संवत ?”
“अरे वही जो पंचांग में रहता है। शायद शक … या शायद विक्रम… चैत्र में रहता है, यह ज़रूर मालूम है।” मित्र ने कहा था।
मैंने फिर उनसे पूछ लिया – “क्या आप जानते हैं कि चैत्र माह में नववर्ष क्यों मनाया जाता है? ” मेरे मित्र मेरी बात सुनकर हंस पड़े और बोले -” आप भी वर्षा जी, कैसी बात कर रही हैं हम सभी जानते हैं कि हमारे हिंदू कैलेंडर में चैत्र से लेकर फागुन तक 12 चंद्र माह होते हैं और इन्हीं को हम एक वर्ष के रूप में मानते हुए चैत्र माह में नववर्ष मनाते हैं।”
उनकी यह बात सुनकर मैंने उनसे पुनः प्रश्न किया कि – “चैत्र माह तो फागुन पूर्णिमा के दूसरे दिन से ही प्रारंभ हो जाता है, फिर नववर्ष हम चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को क्यों मनाते हैं?” मेरी इस बात को सुनकर वे सोच में पड़ गए और कहने लगे – “अब मुझे क्या मालूम… वर्षा जी, मैं नहीं जानता कि ऐसा क्यों है लेकिन मुझे यह मालूम है कि चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही नव वर्ष मनाया जाता है, तो बस मनाया जाता है। अरे, गुड़ी पड़वा की शासकीय छुट्टी भी तो उसी दिन हुआ करती है।”
नववर्ष और नवसंवत्सर को ले कर लगभग इस तरह की बातें मेरे और भी कई महिला- पुरुष मित्र, सहकर्मी समय-समय पर मुझसे करते रहे हैं। वे चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नव वर्ष के प्रथम दिवस अर्थात् नवसंवत्सर के रूप में मनाए जाने के लिए तरह-तरह के दलीलें तो देते हैं लेकिन उनमें से बहुतों को इस बात की जानकारी नहीं है कि आखिर चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को नव संवत्सर प्रारम्भ नहीं हो कर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से क्यों होता है। शक और विक्रम संवत में क्या फ़र्क है। ये दो अलग संवत या वर्ष कैसे हैं।
इस वर्ष हिंदू नववर्ष अर्थात् नव संवत्सर संवत 2078, 13 अप्रैल 2021 को आरंभ हो रहा है। 13 अप्रैल को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि रहेगी, जबकि चैत्र मास फागुन पूर्णिमा के दूसरे दिन अर्थात 30 मार्च 2021 से प्रारंभ हो चुका है और 30 मार्च से 12 अप्रैल तक चैत्र मास का कृष्ण पक्ष है। तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब वर्ष का पहला महीना चैत्र है तो चैत्र का एक पक्ष यानी आधा महीना बीतने के बाद नये साल के पहले दिन का उत्सव मनाने का क्या कारण है!
अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार समय का आकलन करने और समूचे विश्व में समय की गणना प्रणाली में एकरूपता लाने के लिए लागू किए गए अंग्रेजी कैलेंडर जिसे ग्रेगोरियन कैलेंडर भी कहते हैं, को हमने अपनाना शुरू किया है, लेकिन आज भी हिन्दू धर्म के सभी तीज-त्यौहार एवं मांगलिक कार्यों के लिए भारतीय कैलेंडर अर्थात् संवत्सर पर आधारित पंचागों को ही प्राथमिकता दी जाती है।
ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरूआत सन् 1582 में हुई थी। समय की गणना करने के लिए कैलेंडर की आवश्यकता पड़ती है, विश्व के लगभग सभी कैलेंडर सूर्य चक्र या चंद्रमा चक्र की गणना पर आधारित होते हैं। सूर्य चक्र पर आधारित कैलेंडर में 365 दिन होते हैं जबकि चंद्रमा चक्र पर आधारित कैलेंडर में 354 दिन होते हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर सूर्य चक्र पर आधारित है। जबकि हिंदू कैलेंडर अथवा संवत की गणना चंद्रमा चक्र पर आधारित होती है।
वर्तमान में पूरे विश्व में सर्वमान्य ग्रेगोरियन कैलेंडर ईसाई धर्मगुरू यीशु मसीह के जन्म-वर्ष (कल्पित) पर आधारित है। इसीलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर में ईसवी (ई.) ईसा मसीह के जन्म के बाद के वर्षों को दर्शाता है और ईसा पूर्व (ई.पू.) उनके जन्म से पूर्व के वर्षों को दर्शाता है। जबकि इस्लामिक कलैण्डर चंद्रमा चक्र पर आधारित है। इसे हिजरी कलैण्डर भी कहा जाता है। इस्लाम धर्म के आखरी प्रवर्तक हजरत मोहम्मद साहब के पवित्र शहर मक्का से मदीना जाने के समय से हिजरी सन् को इस्लामिक वर्ष का आरंभ माना गया है। इसमें 12 चन्द्र मास होते हैं, जिसमें 29 और 30 दिन के मास एक-दूसरे के बाद पड़ते हैं। इसमें भी वर्ष में 354 दिन होते हैं। इसलिए यह सौर संवत के वर्ष से 11 दिन छोटा हो जाता है। इस अन्तर को पूरा करने के लिए 3 वर्ष बाद ज़िलहिज्ज महीने में कुछ दिन जोड़ दिए जाते हैं। इसी प्रकार भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। हिन्दू कैलेंडर में इसी अंतर को समाप्त करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है। इसे मल मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।

…. तो बात हो रही थी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से भारतीय कैलेंडर की शुरुआत होने की। वर्तमान समय में बहुतों को शायद चैत्र, वैशाख, जेठ, आषाढ़ आदि पूरे बारह महीनों का नाम और क्रम याद भी न हों। लेकिन वे इसे अपना नववर्ष कह कर नवसंवत्सर मनाने हेतु उत्साहित रहते हैं। कहा जाता है कि भारतीय कैलेंडर का आरम्भ उज्जैयिनी के यशस्वी राजा विक्रमादित्य ने किया था, इसलिए इसे विक्रम संवत भी कहा जाता है। उनके समय में सबसे बड़े भारतीय खगोल शास्त्री वराहमिहिर हुए, जिनकी सहायता से विक्रम संवत का प्रसार हुआ। विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है। अतः आगामी 13 अप्रैल यानी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 2021 + 57 = 2078 विक्रम संवत का शुभारंभ हो जाएगा।
यहां मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगी कि भारत का राष्ट्रीय कैलंडर विक्रम संवत नहीं बल्कि शक संवत है। शक संवत पर आधारित यह कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ 22 मार्च 1957 से अपनाया गया। भारत में यह भारतीय राजपत्र, आकाशवाणी द्वारा प्रसारित समाचार और भारत सरकार द्वारा जारी संचार विज्ञप्तियों मे ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ प्रयोग किया जाता है। शक संवत का आरंभ 78 ई. पू. हुआ था जिसे कुषाण राजा ‘कनिष्क महान’ ने अपने राज्य आरोहण को उत्सव के रूप में मनाने और उस तिथि को स्मरणीय बनाने के उद्देश्य से किया था। प्राचीन काल में यह संवत भारत में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता था। 500 ई. के उपरान्त संस्कृत में लिखित सभी ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थ शक संवत का प्रयोग करने लगे थे।

शक संवत सभी भारतीय संवतों में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक, सही तथा त्रुटिहीन हैं। यह समय की सौर-चंद्र गणना पर आधारित है। शक संवत प्रत्येक साल 22 मार्च को शुरू होता है, इस दिन सूर्य विषुवत रेखा पर होता है जब दिन और रात बराबर होते हैं। शक संवत के एक वर्ष में 365 दिन होते हैं और इसका ‘लीप इयर’ ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के साथ-साथ ही पड़ता हैं। ‘लीप इयर’ में यह 23 मार्च को शुरू होता है और इसमें ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ की तरह 366 दिन होते हैं। शक संवत और विक्रमी संवत में महीनों के नाम और क्रम एक जैसे ही हैं- चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ, फाल्गुन। दोनों ही संवतों में दो पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दोनों संवतों में एक अंतर यह है कि जहाँ विक्रमी संवत में माह का आरम्भ पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष से शुरू होता है, वहीं शक संवत में माह का आरम्भ अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष से शुरू हो जाता है। शक कैलेंडर सौर-चन्द्र गणना पर आधारित होने के कारण इस कैलेंडर में चैत्र वर्ष का पहला महीना होता है जिसका पहला दिन वसंत ऋतु के बाद का मार्च-अप्रैल से शुरू होने वाला दिन है। प्राचीन भारत के महानतम ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर (500 ई.) और इतिहासकार कल्हण (1200 ई.) अपने कार्यों में शक संवत का प्रयोग करते थे। उत्तर भारत में कुषाणों और शकों के अलावा गुप्त सम्राट भी मथुरा के इलाके में शक संवत का प्रयोग करते थे। दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट के राजा भी अपने अभिलेखों और राजकार्यो में शक संवत का प्रयोग करते थे।
शक और विक्रम संवत के अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता है कि अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख 22 मार्च सन् 2021 ई. सोमवार को भारत के राष्ट्रीय मिति या कैलेंडर अर्थात् शक संवत 1943 की चैत्र माह की तिथि 01 थी यानी 22 मार्च को शक संवत का नव संवत्सर आरम्भ हुआ था। जबकि उसी दिन विक्रम संवत 2077 की फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि थी। इस प्रकार शक संवत 1943 का नवसंवत्सर आरम्भ 22 मार्च से हो चुका है जबकि विक्रम संवत 2078 का नव संवत्सर आरम्भ 13 अप्रैल यानी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होने वाला है।
अंग्रेजी कैलेंडर के नववर्ष को नकारने वाले व्यक्तियों को यह भी जान लेना चाहिए कि भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर यानी शक संवत के प्रथम दिवस को भी हमारा ही नववर्ष प्रारंभ होता है, इसलिए उस दिन भी “शुभ नववर्ष” कह कर शुभकामनाओं का आदान प्रदान किया जा सकता है।

अब बात आती है चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को नवसंवत्सर के पहले दिन के रूप में पर्व की भांति मनाए जाने की, तो इस संबंध में एक प्रचीन कथा प्रचलित है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जगतपिता ब्रह्म देव ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन श्रीहरि विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था और सतयुग का प्रारंभ भी इसी तिथि को हुआ था। यही वह कारण है कि सृष्टि रचना के दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है। यह भी मान्यता है कि एक अरब 97 करोड़ 39 लाख से अधिक वर्ष पूर्व इस दिन संसार की रचना की गई थी और इसी दिन संसार में सबसे पहला सूर्योदय हुआ था। सृष्टिकर्ता ब्रह्म देव ने चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को सर्वोत्तम तिथि कहा था। देवी आदि शक्ति के नौ रूपों की नौ दिवसीय उपासना का महापर्व नवरात्रि का आरंभ भी इसी दिन से होता है, इसलिए यह तिथि सृष्टि का जन्मदिन भी कहलाती है।
ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्री पंचांग का आरम्भ होता है। ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही की जाती है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विक्रम संवंत् सबसे अधिक प्रासंगिक, सार्वभौमिक और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सूर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित है। हिंदू पंचांग की गणना के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया गया था कि अमुक दिन, अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा। युगों बाद भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस दिन अर्थात् वार से विक्रम संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा माना जाता है और सूर्य जिस दिन बारह राशियों में से पहली राशि मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह दिन अर्थात् वार संवत् का मंत्री माना जाता है। विक्रम संवत् के अनुसार समस्त शुभ कार्य जैसे मुहूर्त, पर्व एवं त्यौहार सम्पन्न होते हैं।

रामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास कहते हैं –
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥

अर्थात् महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है अर्थात् एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया।

बालकाण्ड में ही तुलसीदास कहते हैं –
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥

भावार्थ:-मैं ब्रह्माजी के चरण रज की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने भवसागर बनाया है, जहाँ से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्य रूपी विष और मदिरा उत्पन्न हुए।

रामचरितमानस के लेखन के शभारंभ की तिथि के बारे में लिखते हुए तुलसीदास ने विक्रम संवत का उल्लेख बालकाण्ड में इस प्रकार किया है –

सादर सिवहि नाइ अब माथा।
बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥
संबत सोरह सै एकतीसा।
करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥

अर्थात् अब मैं आदरपूर्वक शिव को सिर नवाकर राम के गुणों की निर्मल कथा कहता हूँ। श्री हरि के चरणों पर सिर रखकर संवत्‌ 1631 में इस कथा का आरंभ करता हूँ।

नौमी भौम बार मधुमासा।
अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।
तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं।।

अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को अयोध्या में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन राम का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ ( अयोध्या में) चले आते हैं।

जिस प्रकार अंग्रेजी कैलेंडर में हर वर्ष को एक संख्या द्वारा लक्षित किया जाता है यथा 2018, 2019, 2020, 2021 आदि, उसी प्रकार शक संवत के वर्षों को संख्या द्वारा पहचाना जाता है, यथा 1942, 1943 आदि, जबकि हिंदू कैलेंडर विक्रम संवत में हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में 60 संवत्सरों का उल्लेख किया गया है। जो क्रमवार चलते हैं। यथा विक्रम संवत् 2076 का नाम परिधावी संवत्सर था, वर्तमान संवत 2077 का नाम प्रमादी है। संवत 2078 का नाम आनंद होगा, किन्तु कतिपय भिन्न मतानुसार राक्षस होगा।

इस प्रकार अलग-अलग प्रांतों, अलग – अलग देशों में अलग-अलग दिन नववर्ष मनाने की प्रथा है। किन्तु अंतरराष्ट्रीय समय गणना की एकरूपता हेतु निर्धारित 1 जनवरी से शुरू हो कर 31 दिसम्बर को समाप्त होने वाला सर्वमान्य कैलेंडर के नववर्ष को नकारना मुझे उचित नहीं लगता। हम धर्म और क्षेत्र के आधार पर नववर्ष तो मनाएं लेकिन सर्वमान्य नववर्ष को भी नहीं नकारें।
…. और अंत में मेरे इन दोहों के साथ आप सभी को विक्रम संवत यानी हिन्दू नवसंवत्सर की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं !!!

नवसंवत्सर आ रहा, लेकर नव उल्लास ।
हर्षित होंगे जन सभी, पूरा है विश्वास ।।

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, विकसित होगा सोम ।
होगी हर्षित यह धरा, पुलकित होगा व्योम ।।

शक संवत राष्ट्र का, विक्रम जन-जन मीत ।
दोनों हैं इस देश के, रखिए इनसे प्रीत ।।

“वर्षा” की शुभकामना, आप करें स्वीकार ।
ख़ुशियों की बरसात हो, आनंदित संसार ।।

—————-

सागर, मध्यप्रदेश

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here