काव्य भाषा : मुक्त कविता – मंजु लता नोयेडा

मुक्त कविता

नज़रें नीचे किए हुए
ज़मीं को पैरों से कुरेदते हुए
शर्मों हया का पर्दा
ओढ़े हुए
तुम कुछ कहना चाहती हो
कह दो न खुल कर
गमों का सैलाब तुम्हें
डुबो देगा,पलते जख्मों में
ज़ख्म इक दिन नासूर बन जायेंगे
कह दो,कह दो न
मैं सारे ग़म ले लूंगा
खुशियों से आंचल भर दूंगा
खिल उठोगी तुम
सारी दुनिया हसीन
लगने लगेगी
शायद तुम्हें, मुझ पर
यकीं नहीं
यकीं करके तो एक बार मुझे देखो
तुम भी मुझे चाहती हो
पर, जुबां ख़ामोश
रखती हो
छोड़ दो खामोशी को
आ जाओ मेरी बाहों में
परख कर तो देखो मुझे
सारी परेशानी मैं ले लूंगा

मंजु लता
नोयेडा

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