काव्य भाषा : आ जाओ अब तो कान्हा-कुन्ना चौधरी जयपुर

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आ जाओ ! अब तो कान्हा…..!!

आ जाओ अब तो कान्हा
माखन मिश्री खाने
आ जाओ !अब तो कान्हा
बाँसुरी धुन सुनाने।।

गोप गोपियाँ ने उत्सव का
रंग है जमाया ,
आ जाओ अब तो कृष्णा
फाग खूब रचाने !!

महामारी के दानव ने
दहशत है फैलाया ,
आ जाओ अब तो दयानिधि
हमें इस दानव से बचाने !

बार बार भगतों की पीर
हरी है भगवन तुमने ,
आ जाओ अब तो गिरधर
नैया पार लगाने !!

लाखों सुदामा तेरी राह
तक रहे है माधव ,
आ जाओ अब तो तुम
बेबसों की लाज बचाने ।।

भटक रहा विश्व मानव
अज्ञान के अंधेरे में,
आ जाओ अब तो प्रभु
जगद्गुरु मार्ग दिखाने !!

कहें जो तू साँवरे हम
नाच नाच तुझे रिझायें ,
आ जाओ अब धरती को
वृंदावन पुन्ह बनाये ।।

कलियुग में ख़ुदगर्ज़ी का
हाहाकार देखो मचा है,
आ जाओ अब तो मनमोहन
दिलों को प्रेम से सजाने !!

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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