निरंतर लेखन का समय मूल्यांकन करता है – बृजेश कानूनगो

होली के प्रसंग पर क्षितिज की रंगारंग गोष्ठी

निरंतर लेखन का समय मूल्यांकन करता है – बृजेश कानूनगो

नगर की साहित्यिक संस्था’ क्षितिज’ के द्वारा होली पर्व के प्रसंग पर एक ऑनलाइन होली गीत गोष्ठी आयोजित की गई। औरकार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री बृजेश कानूनगो ने कहा कि, “आज के आयोजन में जो कविताएं और होली गीत पढ़े गए हैं, उन्होंने आज के समय की व्यथाएं और कोरोना समय की चिंताएं अभिव्यक्त की हैं ।उन्होंने कहा कि ,हमें विभिन्न विधाओं में लेखन करना चाहिए ।जब एक विधा में कदमताल करते हुए थक जाएं तो दिशा बदलकर दूसरी विधा में कदमताल करना प्रारंभ करना चाहिए ।खूब लिखा जाना चाहिए ।जब अधिक लिखा जाता है तब उसी में से कुछ सार्थक निकल कर सामने आता है और कालांतर में उसका मूल्यांकन होता है। कबीर ,सूर और तुलसी ने जो किसी वक्त लिखा है, उसका मूल्यांकन आज का समय कर रहा है। आज के समय के अंधेरों पर और समय की चिंताओं पर जो लिखा जा रहा है, आने वाला वक्त उसका मूल्यांकन करेगा। इसलिए एक लेखक के लिए यह जरूरी होता है कि वह निरंतर लेखन करें और समाज के प्रति अपनी चिंताएं अभिव्यक्त करता रहे।”
नगर की साहित्यिक संस्था’ *क्षितिज* ‘द्वारा आयोजित होली के प्रसंग पर इस गीत /कविता संगोष्ठी में सर्वश्री सुरेश रायकवार ने फागुन का उड़ा गुलाल और बसंत ऋतु पर रचना सुनाकर श्रोताओं को रंगों से सरोबार कर दिया। प्रदीप नवीन ने होली पर शुभकामना देते हुए दो रचनाएं सुनाई। खाई जो थोड़ी सी भांग ने श्रोताओं को मदमस्त कर दिया। अंजू निगम की रचना आगमन और फागुन ने श्रोताओं को बांधे रखा। सुषमा व्यास राजनिधि ने कान्हा मैंने नहीं खेली होली रे ब्रज की होली की याद दिला दी। संगीता तोमर ने अमर हो जाती स्मृति और मौन हूं अनभिज्ञ नहीं रचनाओं का पाठ करके श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। विद्यावती पाराशर ने कविता कोई शब्द नहीं रचना का पाठ करके अपनी कलम की बानगी पेश की। विजया त्रिवेदी ने कोरोना काल पर कहां खो गई होली सुनाकर यथार्थ का चित्रण किया और दूसरी रचना जेठ का पाठ कर मौसम और पति के बड़े भाई के मिजाज से अवगत करके श्रोताओं को खूब हंसाया। संगीता भारूका ने रंगों का मेला और मीठे रंग रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को रंग से भिगो दिया। ज्योतिसिंह ने होली पर मज़ेदार गीत सुनाकर इस आयोजन को पूरी तरह से रंगमय कर दिया। मनीषा व्यास ने अपनी मिठी आवाज़ में दो गीत सुनाएं। अदितिसिंह भदौरिया ने मीरा सा प्रेम और जल रही जमीन रचनाओं का पाठ करके श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ंऔर खूूब दाद बटोरी।

सभी रचनाकारों द्वारा होली गीत और कविताओं के माध्यम से होली के प्रसंग रखे गए। कार्यक्रम में सतीश राठी, अंतरा करवड़े ,वसुधा गाडगिल, कनक हरलालका ,बालकृष्ण नीमा, विजय सिंह चौहान, संतोष सुपेकर, हनुमान प्रसाद मिश्र ,सीमा व्यास आदि लेखक श्रोताओं के रूप में भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन अदितिसिंह भदौरिया ने किया एवं संस्था के सचिव श्री दीपक गिरकर ने आभार माना।

दीपक गिरकर
सचिव क्षितिज

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