काव्य भाषा : मेरे प्यारे पुष्प – नवीन जोशी ‘नवल’, बुराड़ी, दिल्ली

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मेरे प्यारे पुष्प

न प्रपंच ना ही छलछंद
मेरे अंतर्मन का द्वंद्व।।

देखता जब भी तुम्हें
मेरे प्यारे सुमन,
पुनः प्रफुल्लित होता
मेरा व्यथित मन ।
नित तुम्हारे पास आऊं
तुम्हारी भांति मुस्कुराऊं।।

अवनि से अंबर तक
छाया अपार हर्ष,
बस हंसते रहो, करो-
नित नवल उत्कर्ष ।
निश्चित कुछ कहते हो
सदा प्रसन्न रहते हो ।।

कांटों में भी हंस-हंस
स्थिति से लड़ते हो,
कदाचन तभी देवों के
शीश पर चढ़ते हो ।
चाहूं दे दूं आशीष मैं भी,
बस हंसते रहें सभी ।।

नि:शब्द हूं मैं,
बस देखता रहूंगा,
कहना चाहूं पर
कुछ नहीं कहूंगा ।
न ही गीत न कोई छंद,
केवल अंतर्मन का द्वंद्व ।।
मेरे अंतर्मन का द्वंद्व ।।

नवीन जोशी ‘नवल’
बुराड़ी, दिल्ली

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  1. रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार आदरणीय प्रधान संपादक श्रद्धेय देवेंद्र सोनी जी एवं समस्त टीम ‘युवा प्रवर्तक’ ।

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