‘बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा’ होली, होलिका और प्रहलाद का विश्वास- डॉ. वर्षा सिंह,सागर

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

होली, होलिका और प्रहलाद का विश्वास

– डॉ. वर्षा सिंह

एक घना जंगल था जिसमें बरगद का एक वृक्ष था। उस वृक्ष में अनेक शाखाएं थीं, जिनमें तरह-तरह के पक्षी अपना घोंसला बनाकर रहते थे। उन घोंसलों में एक घोंसला किसी नन्हीं चिड़िया का भी था। एक बार उस नन्ही चिड़िया ने अपने घोंसले में कुछ अंडे दिए। समय आने पर उन अंडों में से चिड़िया के नन्हे-नन्हे चूजे पैदा हो गए। अपने उन चूजों की भूख मिटाने के लिए खाना लाने जब चिड़िया घोंसले से उड़ कर बाहर जाने लगी तो बरगद ने उससे कहा कि अरे नन्हीं चिड़िया ! तुम अभी अपने घोंसले से कहीं दूर मत जाओ क्योंकि मैंने देखा है मेरी जड़ों में एक सर्प ने अपना बिल बना लिया है। तुम्हें दूर जाता देख कर वह सर्प यहां तुम्हारे घोंसले में चढ़ आएगा और वह तुम्हारे नन्हें-नन्हें चूजों को खा जाएगा। बरगद की बात सुनकर चिड़िया कुछ समय के लिए असमंजस में पड़ गई। उसने सोचा कि यदि वह खाना लाने घोंसले से दूर नहीं जाएगी तो उसके चूजे भूख से मर जाएंगे। और यदि वह खाना लाने घोंसले से दूर गई तो वह सर्प अपने बिल से बाहर आकर, घोंसले में पहुंचकर उसके चूजों को खा डालेगा।
कुछ देर असमंजस की स्थिति में रहकर सोच विचार करने के बाद उस चिड़िया ने घोंसले से दूर चूजों के लिए खाना लाने का फैसला किया बरगद ने उससे पूछा कि तुम ने मेरी बात नहीं सुनी क्या? जो तुम घोंसले से दूर जा रही हो। तब चिड़िया ने बरगद को उत्तर दिया – “हे वृक्षराज ! मैं अपने घोंसले और घोंसले में स्थित चूजों की रक्षा करने हेतु ईश्वर को दायित्व सौंपकर चूजों के लिए खाना लाने यहां से दूर जा रही हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर मेरे घोंसले और मेरे नन्हे चूजों की रक्षा करेंगे।”
” तो क्या तुम ईश्वर के भरोसे अपने बच्चों को छोड़कर उनसे दूर जा रही हो ?”- बरगद ने फिर से चिड़िया से पूछा। तब चिड़िया ने जवाब दिया – “हां, मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है। मैं ईश्वर के भरोसे चूजों को छोड़कर जा रही हूं। … और फिर वह अपने पंख फैलाकर घोंसले से उड़ गई।
बरगद की जड़ों में अपना बिल बनाकर रहने वाला सर्प ऐसे ही समय की ताक में बैठा हुआ था। जैसे ही वह चिड़िया घोंसले से दूर उड़ कर गई, सर्प धीरे-धीरे पेड़ पर ऊपर की ओर चढ़ने लगा चढ़ता-चढ़ता वह घोंसले के करीब जाने लगा तब बरगद ने सोचा कि चिड़िया अपने बच्चों को ईश्वर के सहारे छोड़ कर चली गई है लेकिन ईश्वर सर्प से चिड़िया के बच्चों की रक्षा भला कैसे करेंगे? बरगद यही सोच रहा था कि सर्प घोंसले के एकदम करीब पहुंच गया । सर्प को घोंसले के समीप आया जानकर चिड़िया के बच्चे जोर-जोर से चहचहाने लगे, मानो वे मदद के लिए किसी को पुकार रहे हों। तब तक सर्प बच्चों के और करीब आ गया और जैसे ही उसने एक चूजे को अपने मुंह में उठाने का प्रयास किया, अचानक एक चमत्कार हो गया। दूर कहीं से एक चील आसमान पर से उड़ती हुई आई और उसने बरगद की डालियों पर घोंसले तक पहुंच चुके सर्प को एक झटके से उठा लिया और वह दूर उड़ गई। चील का आहार सर्प होता है वह अपने आहार को लेकर दूर अपने घोंसले की ओर चली गई।
बरगद भौंचक्का रह गया। उसने तो यह समझ लिया था कि नन्हीं चिड़िया के चूजों का बचना संभव नहीं है। सर्प उन्हें हर हाल में मारकर खा जाएगा, किंतु इस चमत्कार के बाद वास्तव में अब उसे विश्वास हो गया कि चील के रूप में ईश्वर ने नन्हीं चिड़िया के उन बच्चों की रक्षा की है। नन्हीं चिड़िया का विश्वास टूटने नहीं पाया है।
थोड़ी देर बाद खाना लेकर जब नन्हीं चिड़िया अपने घोंसले पर आई तो बरगद ने उसे पूरी बात बताई और ईश्वर के प्रति उसके दृढ़ विश्वास की सराहना की।
तो यह कहानी थी नन्हीं चिड़िया और ईश्वर के प्रति उसके विश्वास की।
एक ऐसी ही कथा है भक्त प्रहलाद की।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, सतयुग में ऋषि कश्यप और दिति की असुर संतान हिरण्यकश्यप नामक असुरों के राजा का पुत्र प्रहलाद ईश्वरीय शक्ति के प्रतीक श्रीहरि विष्णु का अनन्य भक्त था। उसकी इस भक्ति से उसका असुर पिता हिरण्यकश्यप अप्रसन्न रहता था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र का मन ईश्वर की भक्ति से हटाने के लिए अनेक प्रयास किए, किन्तु भक्त प्रहलाद ने ईश्वर की भक्ति का त्याग नहीं किया। अंतोगत्वा हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से इस संबंध में सुझाव लिया। होलिका ने उसे समझाया कि जबतक प्रहलाद जीवित रहेगा, उसकी अंतिम सांस भी ईश्वर की भक्ति में लीन रहेगी। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। इस वरदान का लाभ उठाते हुए होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में उठा कर अग्नि में प्रवेश किया। ईश्वर कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई। दरअसल होलिका को यह वरदान था कि जब वह अकेली आग में प्रवेश करेगी तो वह नहीं जलेगी और यदि किसी और को साथ में लेकर आग में प्रविष्ट हुई तो वरदान निष्फल हो जाएगा। चूंकि, उस दिन वह प्रहलाद के साथ अग्नि में जा बैठी थी इसलिए वह जल गई और आग में बैठने वाले भक्त प्रहलाद को श्रीहरि विष्णु ने बचा लिया। ईश्वर की कृपा से उसका बाल बीका नहीं हुआ। ईश्वर की कृपा से होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रहलाद आग से सुरक्षित बाहर निकल आया…. और तभी से होली पर्व को मनाने की प्रथा आरम्भ हुई। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा ​तिथि तक होलाष्टक माना जाता है। इस दौरान भगवान नरसिंह और बजरंगबली देव हनुमान की पूजा का भी महत्व है। होलाष्टक होली दहन से पहले के 8 दिनों को कहा जाता है। इस बार 22 मार्च 2021 से आरम्भ हो चुका होलाष्टक 28 मार्च 2021 तक रहेगा। होलिका दहन 28 मार्च को किया जाएगा और इसके बाद अगले दिन 29 मार्च को घुरेड़ी होगी यानी रंगों वाली होली खेली जाएगी।

होलिका के जल जाने के बाद हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने के लिए उसे एक खंभे से बांध दिया। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह न तो दिन में मरेगा या रात में, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मनुष्य से मरेगा, न पशु से, न घर के भीतर मरेगा और न बाहर। ऐसी विचित्र और कठिन शर्तों के साथ मिला वरदान उसके लिए अभिशाप बन गया, क्योंकि वरदान के साथ उसने भगवान से विवेक नहीं मांगा। इसलिए श्रीहरि विष्णु ने युक्तिपूर्वक हिरण्यकश्यप का वध कर प्रहलाद की रक्षा करने हेतु मानव और सिंह का मिलाजुला रूप धारण कर नरसिंह अवतार में दिन और रात के बीच के समय संध्याकाल में खंभे से प्रकट हो कर हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में उठा कर अपने नखों से उसका शरीर फाड़ कर वध कर दिया।

कोई भी प्रलोभन एवं बाधा प्रहलाद को भक्ति-मार्ग से विचलित नहीं कर पाई। मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी भक्त घबराता नहीं, धैर्य नहीं छोड़ता, क्योंकि भक्त चिंता नहीं बल्कि चिन्तन करता है। जो ईश्वर का चिन्तन करता है वह स्वतः ही चिंता से मुक्त हो जाता है। अनन्य भाव अर्थात ईश्वर से विशुद्ध प्रेम के संदर्भ में तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में कहा है –

जानें बिनु न होइ परतीती।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई।
जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥

अर्थात् हे पक्षीराज! प्रभुता जाने बिना उन पर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे जल की चिकनाई ठहरती नहीं। अर्थात प्रेम की सबसे पहली शर्त है, उस ईश्वर को जानना, अंतर्घट में उस परब्रह्म परमेश्वर का प्रत्यक्ष होना है। हमें भी प्रहलाद के समान ईश्वर पर विश्वास रखकर उनकी आराधना करनी चाहिए। भक्ति में बड़ी शक्ति होती है।

रामचरित मानस के बालकाण्ड में असुरराज हिरण्यकश्यप और उसके ईश्वर भक्त पुत्र प्रहलाद की कथा का वर्णन इस प्रकार है –

जनम एक दुइ कहउँ बखानी।
सावधान सुनु सुमति भवानी॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।
जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥

अर्थात् आदिदेव शिव देवी पार्वती से कहते हैं कि हे सुंदर बुद्धि वाली भवानी! मैं उनके दो-एक जन्मों का विस्तार से वर्णन करता हूं, तुम सावधान होकर सुनो। श्रीहरि के जय और विजय दो प्रिय द्वारपाल हैं, जिनको सब कोई जानते हैं।

बिप्र श्राप तें दूनउ भाई।
तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन।
जगत बिदित सुरपति मद मोचन।।

अर्थात् उन दोनों भाइयों ने ब्राह्मण सनकादि के शाप से असुरों का तामसी शरीर पाया। एक का नाम था हिरण्यकश्यप और दूसरे का हिरण्याक्ष। ये देवराज इन्द्र के गर्व को छुड़ाने वाले सारे जगत में प्रसिद्ध हुए।

बिजई समर बीर बिख्याता।
धरि बराह बपु एक निपाता॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा।
जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥

अर्थात् वे युद्ध में विजय पाने वाले विख्यात वीर थे। इनमें से एक भाई हिरण्याक्ष को भगवान ने वराह अर्थात् सूअर का शरीर धारण करके मारा, फिर दूसरे भाई हिरण्यकश्यप का नरसिंह रूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा कर उसका सुंदर यश फैलाया।

भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान॥

अर्थात् बाद में अगले जन्म में वे ही दोनों भाई देवताओं को जीतने वाले रावण और कुम्भकर्ण नामक बड़े बलवान और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत जानता है।

मुकुत न भए हते भगवाना।
तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी।
धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥

अर्थात् भगवान के द्वारा मारे जाने पर भी वे दोनों भाई हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप इसीलिए मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मण के वचनों का शाप तीन जन्मों के लिए था। अतः एक बार फिर उनके कल्याण के लिए भक्तप्रेमी भगवान श्रीहरि विष्णु ने फिर राम के रूप में अवतार लिया।

कस्यप अदिति तहाँ पितु माता।
दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा।
चरित पवित्र किए संसारा॥

अर्थात् वहां श्रीहरि विष्णु के उस अवतार में कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौशल्या के नाम से प्रसिद्ध थे। त्रेतायुग के एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसार में पवित्र लीलाएँ कीं।

एक अन्य कथा के अनुसार, हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये किन्तु आदिदेव शिव अपनी तपस्या में लीन थे। देवताओं के निवेदन पर कामदेव देवी पार्वती की सहायता के लिए आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया और आदिदेव शिव की तपस्या भंग हो गयी। शिव को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिव ने देवी पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। इस प्रकार होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।
होली के रंगों में प्रेम, भक्ति और विश्वास समाहित रहता है। इसलिए इस पर्व को मन के सारे द्वेष, सारे मतभेद और सारी कलुषता को मिटा कर सद्भावना और भाईचारे के साथ उल्लास और उत्साह से मनाना चाहिए। साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि जलरंगों के स्थान पर सूखी गुलाल वाली होली खेलना जलसंरक्षण हेतु आवश्यक है।
इस वर्ष कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए शासन द्वारा होली सार्वजनिक रूप से न मानने के लिए लोगों से अपील की गई है।

और अंत में मेरे कुछ दोहे –

सूखी होली खेलना, पानी है अनमोल ।
व्यर्थ गंवाना ना इसे, समझो जल का मोल।।

दादी- नानी की कथा, अब सुनता है कौन !
क्यों जलती है होलिका ? बच्चे हैं सब मौन ।।

माथे पर टीका लगे, गालों लाल गुलाल।
होंठों पर मुस्कान हो,मन का मिटे मलाल।।

‘‘वर्षा’’ हो सद्भाव की, बहे ख़ुशी की धार।
तभी सार्थक हो सके, होली का त्यौहार।।

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सागर, मध्यप्रदेश

2 COMMENTS

  1. होली के अवसर पर चिडिया,और भक्त प्रहलाद पर ईश्वर के अटूट विश्वास की कथा द्वारा प्रेरक संदेश दिया है.
    बहुत बधाई.

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