जल दिवस पर डॉ ब्रजभूषण मिश्र की तीन कविताएं

1
बून्द

बून्द बून्द से घट भरता
बूंदों से सागर बनता
धैर्य रखें जीवन मे मन
बूंदे बनती हैं सरिता

बूंदों को ना नष्ट करें
हर बून्द जिन्दगी है होती
बूंदें हों संरक्षित सीप में
बन जातीं वो ही मोती

जल की बूंदों से है जीवन
ये है विशिष्ट जीवन का धन
हर बून्द जल हो संरक्षण
ब्रज,आओ लें मित्रों ये प्रण

जल को प्यासे हैं हर प्राणी
संकट पृथ्वी पर जल का है
वृक्षारोपण हल जल का है
ब्रज,वृक्षारोपण हल जीवन का है

2
जल

दुरुपयोग करते हम शहरी
नल से आता जल
अनगिन प्यास बुझा सकता
जो व्यर्थ हो जाता जल

सूखा पीड़ित कितनी जनता
और कितना पशु दल
खेत सूखते, ग्रामीड़ों के
जिनका कोई न हल

शिक्षित जन हम सोचें इस पर
करें प्रयोग जब जल
हों सावधान,करें समाधान
ब्रज,है जीवन तभी,जब जल

3
पानी का संकट

जीवन अमृत
जल
लाती रही हैं
मां ,बहने
पनघट से
दूर नदी से
बावली से किसी मरुथल से
मिटाती रही है प्यास
अपनों की
अपनों के स्वप्नों की
पर मर रहा है
पानी आज,
राहें हो रही हैं
असुरक्षित
विषम परिस्थिति है
धरती के
पानी की
धरती पर रहने वाले
हम पुरुषों के
आँख के पानी की भी
सच संकट है आज
पानी का
संकट

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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