लघुकथा : अवध – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

अवध

‘क्या बाबूजी आप भी कैसे-कैसे दोस्तों के साथ महफ़िल सजा लेते हैं घर में….जिन्हें सोफे पर ठीक से बैठने का सलीका भी नही आता… दोनों पैर ऊपर रख कर बैठते हैं वो आपके घनिष्ठ प्रसादीलाल …।’
‘ और वो आपके लँगोटिया यार गज्जू चाचा….
उनका सुडुक-सुडुक चाय पीना भी वाहियात लगता है मुझको। क्या सीखेंगे मेरे बच्चे आप लोगों के रहन-सहन से….।’
अनुज मनसुख को डांट पर डांट लगाए जा रहा था।और वह एक मूक प्राणी सा बिल्कुल निर्विकार एकटक शून्य में ताके जा रहे था….।देखते ही देखते शून्य का दायरा बड़ा होता गया…और उभरने लगे उसमें बरसों पुराने *अवध* की अठखेलियों के धूल धूसरित पारदर्शी दृश्य….

‘अरे मनसुख ..कहाँ हो भई सँभालो अपने बिटुआ को….बहुत दूर तक सैर करा कर लाये हैं हम अपने *अवध* को….देखो पूरे कपड़े गंदे कर दिए हमारे…गोद से उतरते ही नही लाट साहब…. ‘ गजेंद्र ने *अवध* को नीचे उतारते हुए कहा
‘ क्यों *अवध* थका दिया न चाचा को…क्या करें हम गजेंद्र जिद करता है तुम्हारे साथ ही घूमने जाने के लिए…तुम भी तो आ जाते हो इसे हर रोज अपने साथ ले जाने के लिए…सच में तुम्हारे प्यार ने ही इसे बिगाड़ दिया है ..’ मनसुख ने भीतर दौड़ लगाते *अवध* को देखते हुए कहा…

‘तुम तो जानते ही हो मनसुख मैं और तुम्हारी भाभी बच्चों से कितना प्यार करते हैं ।जब से हमें पता चला है कि हमारे जीवन में औलाद का सुख नही है तो हम तो *अवध* पर ही प्यार लुटा कर उस ममतामयी सुख को महसूस कर लेते हैं….’ कहते-कहते गजेंद्र की आँखों में नमी सी आ गई थी उस समय…

मनसुख को यह स्वीकार करने में जरा भी हिचकिचाहट नही थी कि, *अवध* के शून्य से जीवन को अंक दर अंक सँवारने में गजेंद्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।उस समय गजेंद्र ने ही *अवध* की डगमगाती पढ़ाई का जिम्मा लेकर उसे प्रतिष्ठत स्कूल कॉलेज की पढ़ाई करवाई थी । वह स्वयं तो इतना सम्पन्न था नही कि *अवध* का भविष्य बना पाता । आज *अवध* जिस मुकाम पर था वह गजेंद्र चाचा की बदौलत ही संभव हो पाया था ।
‘क्या सोचने लगे पापा….कौनसी दुनिया में खो गए हैं…बाहर आइये अपनी उस कसमसाहट भरी दुनिया से…आपका बेटा अफसर बन गया है अब…शान से जीना सीखिए…थोड़ा बदलिए अपने आपको मेरे स्टेंडर्ड के हिसाब से…उन्हीं लोगों से मेलजोल रखिये जो हमारे लेवल के हैं….’
*अवध* के अहंकार भरे शब्द मनसुख के ह्रदय को सुख पहुँचाने की बजाए भेदते जा रहे थे….वह बेबस सा भली भांति महसूस कर रहा था कि, *अवध* अपने पैरों पर खड़े होते ही अपने मूल धरातल को छोड़ कर हवा में उड़ने का मानस बना चुका है और ऊँचाइयाँ छूने की धुन में उन सभी संस्कारों का, ऊंची शिक्षा का *वध* करते जा रहा है, जो उसे गजेंद्र चाचा की बदौलत ही हासिल हुए थे…।

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चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. Hamesha Ki Tara marm ko bhitar Tak bhedti Hui Ek Aur Shandar Rachna .
    Jis khubsurti se aapane kathanak ko gadha hai vah bahut hi kabile Tarif hai.
    Padhte Hue Sara Drishya Aankhon Ke Samne a Gira Aata Hai .
    👏👏💐💐💐👏👏👏

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