संस्मरण : जीवनपर्यंत साक्षात स्मृति में रहेंगे डॉ मोलासरिया -इंजी.भारत भूषण आर गाँधी

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जीवनपर्यंत साक्षात स्मृति में रहेंगे डॉ मोलासरिया

हर किसी की ज़िन्दगी की किताब में डॉक्टर का एक पन्ना जरुर लिखा हुआ होता है. आपकी ज़िन्दगी की किताब पलटकर देखिएगा ये बात सच निकलेगी. आपकी ज़िन्दगी में बीते हुए सालों में किसी याद या यूँ कहें कि ज़िन्दगी की किताब के पुराने पन्नों पर लिखा हुआ किसी डॉक्टर से जुड़ा किस्सा जरुर मिलेगा.
किसी को डॉक्टर से जुडी कोई मीठी याद होगी जिसमें किसी बच्चे के जन्म के पल होंगे, किसी अपने के बीमारी या ऑपरेशन के बाद चंगे होने की बात होगी, या कोई सहपाठी रहा होगा जो डॉक्टर बन गया होगा और आपके परिवार का रखवाला बन गया होगा और भी न जाने कितने अच्छे कारण हो सकते हैं.
और ठीक इसके उलट किसी डॉक्टर की लापरवाही के कारण कुछ कडवाहट भी होगी, लेकिन ज्यादातर डॉक्टर हरेक के परिवार का वो सदस्य होते है जिन्हें आपने संकट के समय भगवान माना होगा.
मेरे भी अपने अनुभव हैं जो एक नहीं कई डॉक्टर्स से जुड़े हुए हैं, मेरी जिंदगी की किताब में एक पन्ना उस डॉक्टर का भी है जिसने हाल ही में दुनिया से विदा ले ली. डॉक्टर आर एन मोलासरिया जिनका इसी सप्ताह मुंबई प्रवास के दौरान निधन हो गया. डॉक्टर आर एन मोलासरिया इटारसी के मिशन अस्पताल जिसे अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी शासकीय अस्पताल कहा जाता है के बीती सदी के सातवें दशक में चिकित्सक के रूप में पदस्थ थे, बाद में नगर में उन्होंने अपने मित्र डॉ एन आर खंडेलवाल के साथ प्राइवेट प्रैक्टिस की और फिर दोनों मित्र क्लिनिक में आने वाले मरीजों की सुविधा के लिए अलग अलग क्लिनिक चालू कर अपनी सेवाएँ देने लगे.
जिन दिनों डॉ मोलासरिया सरकारी अस्पताल में पदस्थ थे उसी दौरान सत्तरवें दशक में मेरी उम्र के चौथे साल में मेरी ज़िन्दगी की किताब के उस पन्ने पर उनका नाम लिखा हुआ है. आज २०२१ में उस पन्ने को ५५ साल बाद याद कर रहा हूँ. उन दिनों इटारसी रेलवे स्टेशन पर अधिकतर पैसेंजर गाड़ियाँ स्टीम इंजिन से चलती थीं और जब भी वो स्टार्ट होती थीं या इंजिन बोगियों के साथ जोड़ा जाता था तब एक झटका सा लगता था और उन दिनों गाड़ियों की खिड़कियाँ अक्सर उस झटके के कारण अपने आप गिरकर बंद हो जाती थीं. उसी झटके के कारण खिड़की के बंद होने से मेरे बाएं हाथ की तर्जनी को भारी चोट पहुंची थी. मुझे अस्पताल लाया गया, उन दिनों की मौजूद व्यस्थाओं के आधार पर एक छोटा सा ऑपरेशन हुआ और ऊँगली को सपोर्ट देकर पट्टी बांध दी गई. डॉ मोलासरिया ने देखते ही कहा था कि ऊँगली का पूरी तरह सामान्य होना मुश्किल है और हुआ भी यही कि कुछ दिनों बाद जब पट्टी खुली तब ऊँगली का एक तिहाई हिस्सा काटना पड़ा. और यही मेरी ज़िन्दगी की किताब का वो पन्ना है जो उनकी याद के रूप में सदा सदा के लिए जुड़ा हुआ है.

इंजी.भारत भूषण आर गाँधी
पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता
इटारसी

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