काव्य भाषा : नुसरत – आशुतोष तीरथ ,गोण्डा

नुसरत

दिल्लगी करूं इतनी फुरसत कहां
बस देखने की जी भर हसरत मेरी

आओ छांव तक थोड़ा पैदल चलें
कसमें वादों की नही फितरत मेरी

जब हंस हंस संवारोगी जुल्फों को
समझ लूंगा मै हो गई हिजरत मेरी

जाने क्यूं ख्वाबों में तुम आती रोज
वैसे कोई और है कहीं कुदरत मेरी

मिल जाएगी जन्नत और वो सब फिर
अजी करो जो तुम इतनी नुसरत मेरी

आशुतोष तीरथ
गोण्डा

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