सबक-ज़िन्दगी के : खुद के प्रति सजग बनिये – डॉ सुजाता मिश्र सागर

सबक-ज़िन्दगी के:

खुद के प्रति सजग बनिये

“तुम करती क्या हो,तुमने आज तक किया क्या है,बनाया क्या है,जोड़ा क्या है” ये कुछ वो तानें है जो हर स्त्री को जीवन के कई मोड़ पर सुनाएं जातें हैं।देखती हूँ युवावस्था में अधिकांश लड़कियां मायके में रहते हुए घर का सारा काम – काज सम्हालतें हुए, बाज़ार का काम करते हुए पढ़ाई करती हैं, जबकि अधिकांश युवा लड़के बाइक पर सवार हो भटकते हैं… कमाने की उम्र नहीं और घर का काम करने में उन्हें शर्म आती है… जिम जाएंगे,बॉडी बनाएंगे… शाम होते ही घूमने – भटकने निकल जाएंगे…रात को घर लौटेंगे,टीवी देखेंगे,खाएंगे और सी जाएंगे।लेकिन मजाल है जो माँ, चाचियां और मोहल्ले की आंटियां उन निठल्लों से पूछ लें कि दिनभर करते क्या हो?सारी निगरानी,सारे तंज सब लड़कियों के सिर! लड़कियों का पढ़ना आज भी कई परिवारों में उनकी इच्छाशक्ति पर है…घर का काम काज करना पहले जरूरी है।

शादी के बाद स्थिति कौन सी अच्छी है!नौकरी पेशा हो या घरेलू … पढ़ी -लिखी को या अनपढ़.. सवाल वही है करती क्या हो!घर भी देखो…ऑफिस भी देखो…आपकी कमाई भी जाएगी और तंज भी पड़ेंगे कि करती क्या हो?जोड़ा क्या है?

जिस दिन स्त्री जवाब देना शुरू करती है कि उसने कब किसके लिए क्या किया है, कब,कहाँ,क्या,कैसे कमाया और कैसे जोड़ा है तब उसे बच्चा समझकर चुप करवाने वालो की भीड़ आ जाती है।समाज आपके प्रति सदैव क्रूर रहेगा… आपकी मेहनत,त्याग और योगदान को कभी कोई काउंट नहीं करेगा।बेहतर है स्वयं अपने कर्म, अपने त्याग और अपनी कमाई का हिसाब रखना सीखिए। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना भर काफी नहीं है, जोड़ना ,और बचाना भी काफी नहीं है…याद रखना और याद दिलाना भी जरूरी है कि आपने किया क्या है। नहीं तो आपकी मेहनत,सब्र और त्याग का फल सदैव दूसरे लूटेंगे और आपका मनोबल अलग तोड़ के रखेंगे कि तुमने किया क्या है!

सबसे बड़े दोषी तो वो माँ – बाप ही होते हैं जो झिड़क खाकर रह जाना, दुत्कार सह के रह जाना जैसे संस्कार बेटियों को देते हैं! उन्हें दूसरों का सम्मान करना तो सिखातें है पर कभी अपने सम्मान के लिए लड़ना नहीं सिखाते। इसलिए अपने सम्मान के लिए खुद लड़ना सीखिए, और आत्मसम्मान की इस लड़ाई में उपदेशकों से दूर रहिये। उपदेशक सिर्फ स्त्रियों के जीवन में आते हैं,पुरुषों के जीवन में नहीं। स्त्री को स्वयं अपना मार्गदर्शक बनना पड़ता है, नहीं तो करते भी जाइये और सुनते भी जाइये अनर्गल! सजग बनिये, याद रखिये त्याग और समर्पण की भी एक सीमा होती है।

डॉ सुजाता मिश्र
सागर

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