काव्य भाषा : नज़्म – अदिति टंडन ,आगरा .

0 नज़्म

जब तुम
बिंदिया सजाती हो तो
लगता है कि
सारी कायनात का
इश्क सिमट आया है
तुम्हारे जबीं पर

जब तुम
मेरे नाम को
उकेरती हो हिना से
तब लगता है कि
बसंती एहसास घुल गया है
तुम्हारी हथेली पर

जब तुम
सुर्ख गुलाबों की रंगत से
संवारती हो अधरों को
तो लगता है
जैसे सांझ की लालिमा
ठहर गई है
तुम्हारे लबों पर

जब तुम
सजदा करती हो तो
यूं लगता है कि
कोई नूर उतर आया है
हमारे दिल की जमीं पर ।

अदिति टंडन
आगरा .

– जबीं _ माथा

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