विविध : कटते वन और घटते वन्य जीव – सतीष भारतीय सागर

कटते वन और घटते वन्य जीव

हमारे देश में जिस तरह आज वनों को काटा जा रहा है वह एक कुतूहलजनक मुद्दा है क्योंकि हमारे पर्यावरण और वन्यजीवों की हिफ़ाज़त वनो पर अवलंबित है आज के कल्प में जैसे-जैसे वनों को काटा जारा उससे निकृष्ट प्रभाव यह देखने को मिल रहा कि हमारे चीता, भालू, तेंदुआ, चीतल, सांभर, बाघ, हाथी, शेर, नीलगाय, घड़ियाल जैसे आदि वन्यजीव दिन-बा-दिन कम होते जा रहे है तथा इस वक्त हमारे लिए भी शहरों में खुले वातावरण में सांस लेना मुहाल हो गया है आलम यह है कि रफ्ता-रफ्ता प्रदूषण तो हो ही रहा है मगर इंसानों का शरीर बीमारियों का अड्डा भी बन रहा है।

एक वक्त था जब वन्यजीव हमारे ग्रामीण अंचलों में सवेरे-सवेरे जंगलों से निकलकर सड़कों पर और अन्य जगहों पर देखने मिल जाते थे लेकिन आज हमें अभ्यारण्यों और जंगलों में वन्यजीवों को देखने के लिए जाना पड़ता है।

ध्यानतव्य है कि वर्तमान कल्प में शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने और सार्वजनिक स्थलों का नवीनीकरण करने के चक्कर में कहीं हम वनों को तबाह तो नहीं करते जा रहे? आज की दुनियाँ में मुसलसल टेक्नोलॉजी को इंसान करीबी बनाता जा रहा है और प्रकृति व वन्य जीवों से दूर होता जा रहा है।

हमारे मुल्क में वन्यजीवों की चिंतनीय स्थिति में इसलाह एवं वन्यजीवों के संरक्षण के लिये राष्ट्रीय वन्यजीव योजना वर्ष 1983 में प्रारंभ की गई और जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के साथ मिलकर किये गए एक विस्तृत अध्ययन के उपरांत ज्ञात हुआ कि 1970 से 2012 के मध्य वन्यजीवों की आबादी में 58% की कमी आई तथा 2020 तक 67℅ कमीं का अनुमान लगाया गया था।

वहीं वाइल्ड लाइफ़ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क ‘ट्रैफ़िक’ के अनुसार दुनिया के प्रथक-प्रथक देशों में लगाए गए लॉकडाउन का वन्यजीव संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

कोरोना वायरस के कारण देश में लागू लॉकडाउन के दौरान जंगली जानवरों के अवैध शिकार के मामले भी दोगुने हुए थे वन्यजीव व्यापार निगरानी नेटवर्क ‘ट्रैफिक’ और एक वैश्विक गैर सरकारी संगठन के अध्ययन में बताया गया है कि 10 से 22 फरवरी 2020 के मध्य जानवरों के शिकार की घटनाओं की तादाद 35 थी जबकि लॉकडाउन के दौरान 23 मार्च से तीन मई 2020 के बीच ऐसी 88 घटनाएं सामने आईं थी तथा वाकई देने योग्य बिन्दु यह भी है कि वर्ष 2019 में गिर के जंगल में 20 से ज्यादा शेर वायरल संक्रमण का शिकार हुए थे और कई ऐसे वायरस प्रजनित हो रहे हैं जो हमारे वन्यजीवों की दशा निकृष्ट कर रहे हैं
और आप यह बखूबी जानते हैं कि पिछले वर्ष आस्ट्रेलिया में लगी आग से कई वन्यजीवों की जान चली गयी थी जिससे संभावना है कि कई वन्यजीवों की प्रजातियां शायद विलुप्त भी हो गयी है।

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर तकरीबन 1.6 बिलियन लोग (वैश्विक आबादी का लगभग 25%) अपनी आजीविका के लिये वनों पर आलंबित हैं, जिनमें से बहुत से लोग विश्व के सबसे मुफलिस समुदाय से संबंधित हैं इससे आप तसव्वुर कर लीजिए हमारे जंगलों में वनों पर वन्यजीव कितने आश्रित होते है।

आज से ही नहीं वरन् प्राचीन मन्वंतर से जंगलों के पास के इलाकों और खासकर क्षेत्रीय स्तर पर अतीव रूप से वनों की कटाई और वन्यजीवों का शिकार हो रहा है बस होता यूँ है कि जो प्रशासन की नजर में आ गया तो वह न्यायसंगत बिन्दु बन जाता है वरना वनों की कटाई और वन्यजीवों का शिकार धड़ल्ले से हो रहा है तथा इस वर्ष विश्व वन्यजीव दिवस 2021 की थीम संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा ‘वन और आजीविका: लोगों और ग्रह को बनाए रखना’ रखी गयी है।

मगर जैसा हाल आज वन और वन्य जीवों का दिख रहा है उससे प्रतीत होता है कि रफ्ता-रफ्ता इंसानों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए वनोन्मूलन का कार्य किया है तथा इंसान आधुनिकीकरण की आड़ में वनों और वन्यजीव संरक्षण को विस्मृत करता जा रहा है।

एक अनुमान के मुताबिक ज्यादातर वन्यजीवों का शिकार उनके मास को
खाने कि लिए किया जा रहा है एवं वनों को काटकर उनके दरवाजे और फर्नीचर तथा घरेलू प्रथक-प्रथक वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है
जिसके अस्बाब से वन कट रहे हैं और वन्यजीव घट रहें हैं।

वनों के कटने से यह स्थिति पैदा हो रही है कि हमारे वन्यजीवों को मुनासिब आवास की व्यवस्था भी नहीं है जो उनके लिहाज से उन्हें उपयुक्त सुरक्षा प्रदान कर सके इसलिए हमारी अग्रता वन्यजीवों के लिए उपयुक्त आवास व्यवस्था और वन व वन्यजीव संरक्षण होनी चाहिए
क्योंकि यही हमारे जीवन में स्वास्थ्य पर्यावरण के निर्माण के लिए नितांत अत्यावश्यक है।

सतीष भारतीय
सागर

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