काव्य भाषा : उठो नारी – सपना “नम्रता”, दिल्ली

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उठो नारी

नारी तुम्हें अब उठाना होगा
तोड़ चुप्पी अपनी, आवाज़ तुम्हें उठानी होगी
बहुत सह लिया तुमने अब तक
अपनों के लिए
तुम्हें अब अपने लिए भी
जीना होगा….
ख़ुद को न समझ
तू कमज़ोर
बिना तेरे सृष्टि का अस्तित्व
मिट्टी में मिल जाएगा
दुर्गा भी तू
चंडी भी तू
ममता की मूरत भी तुझसे …
इस धोखे में न रहना तू
फिर तेरी लाज़ बचाने
कलयुग में भी कृष्ण बन कोई आएगा
बन काली तुझे अपनी लाज़
ख़ुद बचानी होगी ……
रुकना नहीं, झुकना नहीं
तोड़ विवशताओं के बंधन सारे
तुम्हें बस आगे ही बढ़ते जाना है
कर ख़ुद पर यकीन
सपनों को कर पूरा
अपना सम्मान तुम्हें ख़ुद पाना होगा…..
दूसरों के लिए ही तो
जीते रही हो अब तक
ख़ुद के लिए अब जीना होगा।

सपना “नम्रता”
दिल्ली।

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