काव्य भाषा : मुस्कुरा कर जीयो – वीरेन्द्र कुमार साहू ,सूरजपुर

मुस्कुरा कर जियो

कुछ कुर्ते हैं
जो टंगे हैं
मेरे घर की खूंटी में
हां वो पुराने हैं
बड़े सुराख हैं
उन टंगे कुर्तों की खूंटी में ।
जीवन का रहस्य भी
बड़ा निराला है
जो पास है वह अधूरा
जो नहीं है वह अधूरा ।
चुप में भी सोर है
और झरनों के सोर में भी
असीम शांति
ढूंढ लो वह सब
जो पास में बिखरे पड़े हैं।
छोड़ दो उन्हें जो
दूर कटे-फटे पड़े है
समेटकर मुस्कुराओ और
मुस्कुरा कर जिए जाओ।।

वीरेन्द्र कुमार साहू
सहायक शिक्षक
प्राथमिक शाला गेरुवाडाँड़,
लांजीत ओड़गी जिला सूरजपुर छत्तीसगढ़
Mo 9926121847

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