काव्य भाषा : नारी की सोच- संजय जैन मुंबई

नारी की सोच

गिरती रही उठती रही
फिर भी चलती रही।
कदम डग मगाए मगर
पर धीरे धीरे चलती रही।
और मंजिल पाने के लिया
खुदसे ही संघर्ष करती रही।
और अपने इरादो से
कभी पीछे नहीं हटी।।
गिरती रही उठती रही…।।

ठोकरे खाकर ही मैं
दुनियां को समझ पाई हूँ।
हर किसी पर विश्वास
का फल भी भोगी हूँ।
लूट लेते हैं अपने ही
अपने बनकर अपनो को।
क्योंकि गैरो में कहाँ
इतनी दम होती है।।
गिरती रही उठती रही..।।

दुनियांदारी का अर्थ
तभी समझ आता है।
जब कोई विश्वास अपना
अपनो का तोड़ देता हैं।
और अपने फायदे के लिए
अपनो को ही डस लेता है।
फिर इंसानियत की दुहाई देकर
खुदको महान बना लेता है
खुदको महान बना लेता है।।
गिरती रही उठती रही
फिर भी चलती रही..।।

संजय जैन
मुंबई

2 COMMENTS

  1. संजय जी की रचना यथा चित्रण को व्या करती है। इसलिए बहुत बहुत उन्हे बधाई।

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