काव्य भाषा : नारी तुझमें कई कलाएँ – चरनजीत सिंह कुकरेजा, भोपाल

नारी तुझमें कई कलाएँ

जाने कितनी हैं भुजाएँ,नारी तेरे भीतर ।
एक पेड़ और कई लताएँ, नारी तेरे भीतर।

कहीं तू जननी,कहीं पत्नी है,कहीं बेटी सखी और बहना ।
तुझसे ही तो नर नारायण है,तू ही नर का गहना।

एक ग्रन्थ में कई कथाएँ, नारी तेरे भीतर।
जाने कितनी हैं भुजाएँ,नारी तेरे भीतर।

घर बाहर के दायित्व निभाती,
कर्म से अपने न उकताती ।
हर क्षेत्र में वर्चस्व है तेरा ,
मर्यादाओं का न तोड़ा घेरा।

ब्रह्मांड की सभी दिशाएँ, नारी तेरे भीतर।
जाने कितनी हैं भुजाएँ,नारी तेरे भीतर ।

काँटों में भी खिली खिली है,
संस्कारों के सँग-सँग चली है।
तालमेल बिठलाती सबसे,
अंधियारों में दिव्यजोत जली है।

जाने कितनी हैं आशाएँ ,नारी तेरे भीतर।
जाने कितनी हैं भुजाएँ,नारी तेरे भीतर।

जो अपमान करता है तेरा,
अस्त व्यस्त है उसका बसेरा।
घर तुझसे ही घर है बनता,
तू सींचती तभी पनपता।

जाने समाहित कितनी कलाएँ, नारी तेरे भीतर।
जाने कितनी हैं भुजाएँ,तेरे भीतर ।

चरनजीत सिंह कुकरेजा,
भोपाल

1 COMMENT

  1. अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मातृशाक्ति को समर्पित कविता में आपने बहुत ही उम्दगी से नारी के विविध रूपों को उद्घाटित कर नारी शक्ति के अनेक आयामों से परिचय करवाया है।
    आपका यह प्रयास निश्चय ही नारी के प्रति सम्मान की भावना में और सहायक होगा।

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