लघुकथा : ऋतु बदल गई है – चरनजीत सिंह कुकरेजा, भोपाल

ऋतु बदल गई है
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‘सुनो जी…आपकी वर्जिश पूरी हो गई हो तो कुछ मन की बात कहूँ आपसे ‘ अमृता ने जसबीर से थोड़ा झिझकते हुए पूछा
‘अरे अमृत…! तुझसे कितनी बार कहा है चिंता मत किया कर….तेरी सेहत के लिये ठीक नही है ये सब…’ जसबीर ने टॉवेल से पसीना पोंछते हुए समझाने की कोशिश की…।
‘ नही जी चिन्ता जैसी तो कोई बात नही है…मैं तो बस इतना कह रही थी कि…’ उसने उनका मूड भांपते हुए मन की बात जारी रखी…’ चलो न इस बार मिल आते हैं ऋतु और बच्चों से…. शादी के बाद एक बार ही तो आ पाई थी वह…पहले ही साल ईश्वर ने उसे एकसाथ दो औलादों का सुख दे दिया….।फिर बंध गई अपनी ऋतु उनकी परवरिश में…।’
फिर थोड़ा साँस लेते हुए बोली ‘क्यों जी…हमने कहीं जल्दी तो नही की उसे ब्याहने में….।अभी तो उसे मैं घर गृहस्थी की ऊँच-नीच,ससुराल में रहने के तौर तरीके भी नही समझा पाई थी….’
‘इस सबके लिए उसके पास वक्त ही कहाँ बचता था…दिन रात किताबें,पढ़ाई,ग्रेजुएशन पूरा करने की धुन में ही तो रमी रहती थी वह ….’ जसबीर ने भी गहरी श्वांस छोड़ते हुए कहा
‘वो तो अच्छा रिश्ता आया…संजोग बने और कर दिया बिदा उसे…आखिर एक न एक दिन ब्याहना ही तो था बिट्टो को…’
‘ छोड़ो अब वह सब …चलो न इस बार चलते हैं , फोन कर देते हैं उसे…परसों दोनों बच्चों का जन्मदिन भी है…वहीं सेलिब्रेट करेंगे…देख आयेंगे दो तीन दिन रहकर उसकी सास का स्वभाव….वैसे देखने सुनने में तो बहुत अच्छी ही लग रही थी….’
‘तुम भी न जसप्रीत…आज दो-तीन सालों में ऋतु ने कोई शिकायत की है उनके बारे में…हमेशा गुणगान ही करते सुना है उसको फोन पर …..दामाद जी..देवर सभी के सहयोग से ही तो वह दोनों बच्चों को ठीक से संभाल पा रही है…’
‘आप पिता हैं न…माँ के दिल की धुकधुकी आपको कहाँ सुनाई देगी.. एक बार आँखों से जा कर देख आऊँ, तभी तसल्ली होगी मुझे…यहाँ तो उसे एक काम नही करने देती थी मैं… वहाँ जा कर लग गई होगी चूल्हे-चौके में… और दामाद जी ने भी बढ़ा लिया परिवार पहले ही साल…बेचारी को सम्हलने का मौका ही नही दिया…’
‘तुम अब कुछ भी कह लो….मुझे तो चिंता होती है…’ अमृता ऋतु के यहाँ चलने के लिए जसबीर को पूरी तरह राजी करने में लगी थी,कि तभी जसबीर का मोबाइल बज उठा …..
‘ हैलो …अरे ऋतु कैसी हो…बच्चे कैसे हैं…’
ऋतु का नाम सुनते ही अमृता के कान खड़े हो गए..चेहरे के रँग तब्दील होने लगे…’लाओ लाओ मुझे दो मोबाइल ….’ कहते हुए उसने जसबीर से मोबाइल झटक ही लिया… ‘ हाँ बेटा मम्मा बोल रही हूँ..कैसी है तू….हम लोग तो कल तेरे घर…..’उसकी बात बीच मे ही रह गई
‘अरे मम्मा मैं बिल्कुल ठीक हूँ… आप थोड़ा साँस ले लें जरा फिर बताती हूँ…’ ऋतु ने हाँफती हुई अमृता को बीच में ही रोक दिया था।
फिर थोड़ा रुकते हुए बोली ‘ मम्मा जी हम सब कल आपके पास आ रहें हैं…बच्चों का बर्थ डे वहीं मनाएंगे…बच्चों के दादा-दादी भी रहेंगे साथ….आप किसी किस्म की चिंता नही करना…इन्होंने ऑनलाइन होटल वगैहरा सब बुक कर लिया है…आप लोगों को कोई व्यवस्था नही करनी है…देवर जी सब सँभाल लेंगे…’
‘पर बेटा हम लोग तो….’
‘अब रखिये मम्मा कल वहाँ आकर ही बात करूंगी…अभी मुझे अपनी सहेलियों को भी पार्टी का निमंत्रण देने के लिए बहुत सारे फोन करने हैं…ठीक है.. पापा को भी बात देना सब बातें….’
अमृता जसबीर को फोन देते हुए उसके सीने से लग गई… ।जसबीर की नजर खिड़की से होती हुई बाहर के आसमान पर गई…थोड़ी देर पहले आसमान पर छाए चिंताओं के बादल पूरी तरह छंट चुके थे….चिड़ियाएं घर की मुंडेर पर चहचहाने लगी थी…। उनकी चीं-चीं सुन अमृता मुंडेर पर दाना पानी रखने के साथ खुले आसमान को देखते हुए महसूस कर रही थी कि – ऋतु पूरी तरह बदल गई है…. सँभल गई है…..।


चरनजीत सिंह कुकरेजा,
भोपाल

2 COMMENTS

  1. धीर-गम्भीर,मुश्किल और भारी साहित्यिक शब्दों के बजाय आम बोलचाल में प्रयुक्त , हृदय के अधिक निकट आम शब्दों के द्वारा एक माँ की चिंताओं और फिर बिटिया द्वारा जिस सकारात्मकता व सहजता के साथ माँ की चिंताओं का निराकरण किया गया है, पढ़ कर बहुत ही आनन्द आ गया ।
    आप की लेखनी को शत-शत प्रणाम।
    🙏🙏🙏

  2. मैं भी अपनी रचना या व्यक्तिव विकास से संबंधी आलेख भेजूंगी।
    सदुवाद आपको
    सादर
    जया आर्य।

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