काव्य भाषा : प्रकृति की प्रकृति -राजीव रंजन शुक्ल पटना

प्रकृति की प्रकृति

पूछती नहीं नदी अपनी धारा बहाऊँ किस दिशा
सूर्य पूछ कर फैलाता नहीं उषा
चाँद क्या पूछकर करता है प्रकाशित घनघोर निशा
बहती नहीं हवा किसी से पूछ कर अपनी गति और दिशा
नदियों को चाहिए नहीं सागर मे मिलने का अनुमोदन
उड़ने से पहले पंछी नहीं करते अंबर मे खतरों का अवलोकन
पेड़-पौधे कितनी रखें अपनी ऊँचाई
क्या किसी ने निर्धारित कर इन्हे बताई
फिर क्यों इनकी अविरलता मे हमने बाधा है पहुंचाई
इसीलिए क्या प्रकृति समय समय पर अपनी रौद्रता दिखाती
अपनी रौद्रता दिखाकर हमे यह सिखाती
प्रकृति की प्रकृति की नहीं बदलों आकृति
प्रकृति की प्रकृति का करे नहीं हम आहुति ॥

राजीव रंजन शुक्ल पटना , बिहार

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