विविध : ज्ञान से ही संसार है – कीर्ति तोमर दिल्ली

ज्ञान से ही संसार है

एक समय हुआ करता था, जब स्कूल, कॉलेज नाम का कुछ नहीं हुआ करता था। बच्चे गुरु जनों से शिक्षा का स्तर प्राप्त करते थे, और जहां भर की जानकारी प्राप्त करते थी। उस समय ना डिग्री का डर था और ना ही नौकरी का, लोग अपने सीधेपन, ज्ञान और संस्कारों से आंके जाते थे, ना कोई परीक्षा थी और ना अंक जिससे उनकी सीमा का अंदाज़ा लगाया जा सके। असल में शिक्षा का असली मतलब ही वही है, जहां लोगो को अंको/ डिग्री से नहीं बल्कि ज्ञान से आंका जाए। और एक आज का समय है जहां केवल अंधेपन की तरह ग्रेड्स/नंबर/डिग्री को देखकर उनका स्तर पता करते है। उन्हें नौकरी मिलेगी या नहीं ये बात का फैसला भी उनके अंक तय करते है।
कितना ज़्यादा बदल गया है ना हमारा समाज? जहां ज्ञान का आदर नहीं बल्कि अंको के नियम से तय किया जाता है, उसका भविष्य क्या होगा वो भी उसपे निर्धारित किया जाता है। अगर उसने ज्ञान का सागर छुपा है, और अंक कम है तो उसे अनाड़ी का खिताब देके उस अलग फेक दिया जाता है, और उसे ये विश्वास दिलाया जाता है कि को कभी कुछ नहीं कर सकता, अगर उसके अंक नहीं आए है तो उसका ज्ञान बेकार है ज़िन्दगी में कोई काम नहीं आयेगा। ये है हमारा समाज जो विवश करता है उन्हें आत्महत्या करने के लिए।
अगर ग्रेड्स नहीं तो ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा उनके लिए, नौकरी भी अंको पे निर्धारित की जाती है और ये समाज कभी बच्चो के सर्व ज्ञान को नहीं समझ पाया और ना ही कभी समझ पाएगा । हर साल हज़ारों बच्चे आत्महत्या करते है नंबर कम आए आगे कुछ नहीं होगा अब हमारा ,ये सोचकर मन ही मन में घुटते है और ये समाज कभी इसे नहीं पाता, कभी नहीं।
पर फिर भी बिना कोई चिंता जताए हर साल लाखों बच्चो को मौत के हवाले कर दिया जाता है। ऐसी शिक्षा से क्या कभी ज्ञान को परखा जा सकता है? कभी नहीं!
लोग कहा करते थे, ज्ञान शिक्षा वही है जो किसी के काम आए, वो नहीं जो लोगो से उसकी शक्ति उसका मनोबल उसकी ज़िंदगी छीन ले।

©कीर्ति तोमर
दिल्ली

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