काव्य भाषा : इंतज़ार – कुन्ना चौधरी जयपुर

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इंतज़ार

कुछ साँसें बाक़ी है अभी ,
कुछ और जी लेने दो मुझे!
ख़्वाहिशें है कुछ बाक़ी अभी,
सपने और देख लेने दो मुझे ।।

ठंड कंपकंपाती है अब भी ,
अलाव ज़रा तप लेने दो मुझे!
दिल में कशिश बाक़ी है ज़रा ,
दिया बन कर जलने दो मुझे!!

बंद आँखों से महसूस कर लेती हूँ ,
उसकी महक तो आने दो मुझे !
कानों की ज़रूरत क्यों हो भला ,
धड़कनों से आहट सुनने दो मुझे!!

तन और धन के ही रिश्ते होते है क्या,
मन के बंधनों को तौल लेने दो मुझे!
रूह के ज़ख़्म यूँही नहीं भरते …
अश्क़ की बूँदों से धो लेने दो मुझे!!

जाना है चली जाऊँगी जरा ठहरो ,
कुछ यादों को समेट लेने दो मुझे!
लौट के फिर ना आयेगा वो शायद,
कुछ देर तो इंतज़ार कर लेने दो मुझे!!

कुन्ना चौधरी
जयपुर